नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने मयूर विहार में प्रो.सुधाकराचार्य त्रिपाठी के आवास पर सामवेद की सप्तमकथा के दूसरे दिन सामवेद में पवमान सोम, इन्द्र और अग्निदेव सम्बन्धी मन्त्रों की कथा कही।
सामवेद में ऋषियों ने पवमान सोम को दक्षसाधन कहकर सम्बोधित किया। दक्षसाधन वह है जिसके साधन भी सही हों और जो साधनों का सही प्रयोग करने में दक्ष हो। यह शरीर आत्मा का साधन है, उसका सही प्रयोग ही जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। जिसमें भी क्रीडा, विजीगीषा, व्यवहार, द्युति, स्तुति, मोद, मद, स्वप्न, कान्तिऔर गतिशीलता है, उस में देवत्व है। संस्कार से ही यश होता है। उन्होंने अग्नि, इन्द्र, मरुत्,वायु और देवताओं की मैत्री के माध्यम से मैत्री सम्बन्ध के महत्त्व को वर्तमान उदाहरणों से समझाया। इन्द्ररूप आत्मा अश्वपति है। वह काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ और मात्सर्य - छ: ऊर्मियों और दस इन्द्रियों के घोड़ों को नियन्त्रित करता है। यही उसका बल है। अपनी भुजाओं का बल ही कार्य के फल को रसयुक्त बनाता है, उसमें स्वाद पैदा करता है। आत्मा प्रसन्न हो तो सब ठीक। जैसे कानों को प्रिय स्तुतियों से देवताओं को प्रसन्न किया जाता है, उसी प्रकार कार्य करने वालों को प्रशंसा से प्रोत्साहित करना चाहिए। त्रिपृष्ठ पद सोम से सम्बद्ध द्युलोक, पर्जन्य और पृथ्वी(पुरुष और स्त्री सहित) रूप पाँच अग्नियों का प्रतीक है। अपने शरीर की अग्नि अर्थात् तापमान को ठीक रखना चाहिए।

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