नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने मयूर विहार में प्रो.सुधाकराचार्य त्रिपाठी के आवास पर सामवेद की सप्तमकथा में सामवेद में मृत्यु के बाद द्युलोक में सोमराजा से माता के गर्भ से शिशु रूप में जन्म लेने तक की यात्रा के रहस्यों को प्रकट किया।
सामवेद, ऋषि और देवता का परिचय देते हुए प्रो.पूनम ने सामवेद के उत्तरार्चिक के तृतीय और चतुर्थ प्रपाठक की कथा प्रारम्भ की। उन्होंने अकृष्टा माषा के अर्थ को शिलोञ्छवृत्ति के माध्यम से समझाया। ऋषियों की परम्परा का परिचय दिया। उन्होंने कलश और पात्र पद को सोम के सन्दर्भ में स्पष्ट किया। सोम द्युलोक - पर्जन्य - पृथ्वी - पुरुष - स्त्री रूप पात्रों / कलशों में परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी के प्रवाह से उतरता है। स्वयं पवित्र और सभी को पवित्र करता हुआ विस्तार के लिए विद्युत् की तरह प्रकट हो कर दैदीप्यमान होता है। सूर्य की किरणों के समान तेजस्वी सोम त्वचा की कालिमा को अर्थात् विभिन्न इन्द्रियों के दोषों को दूर करता है। वैदिक मन्त्रों से स्पष्ट होता है कि ऋषियों को आधुनिक विद्वानों से पूर्व ज्ञात था कि पृथ्वी पर जल नहीं बल्कि पृथ्वी जल में है। उन्होंने संस्कार करने के अर्थ को भी सोम के सन्दर्भ में घटित किया। उन्होंने इन्द्र, दधीचि और वृत्र के आख्यान को *नवतीर्नव* पद के माध्यम से वैज्ञानिक आधार पर स्पष्ट किया।

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