नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। उर्दू विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ और इंटरनेशनल यंग उर्दू स्कालर एसोसिएशन के संयुक्त तत्वावधान में “वकार रिज़वी और अवधनामा” विषय पर एक गरिमामय ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें देश-विदेश के विद्वानों, साहित्यकारों एवं शोधार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य वकार रिज़वी के साहित्यिक, पत्रकारिक एवं सांस्कृतिक योगदानों का मूल्यांकन करना तथा नई पीढ़ी को उनसे परिचित कराना था।मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. वज़ाहत हुसैन रिज़वी ने कहा कि वकार रिज़वी एक ऐसे व्यक्तित्व थे, जिनमें समाज को जोड़ने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने सत्य और निष्पक्षता को पत्रकारिता का मूल आधार माना तथा सदैव युवा लेखकों को प्रोत्साहित किया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आज उनकी पत्नी “अवधनामा” को निरंतरता प्रदान कर रही हैं, जो अत्यंत सराहनीय है।
कार्यक्रम का शुभारंभ अरीबा सरफराज द्वारा पवित्र कुरआन के पाठ से हुआ। संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रख्यात आलोचक प्रोफेसर सगीर अफराहीम ने की, जबकि संरक्षक के रूप में प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथियों में अमीर मेहदी (इंग्लैंड), डॉ. कहकशां इरफान तथा डॉ. मुजीब शहज़र शामिल रहे। संचालन गुलाम अब्बास (लखनऊ) ने किया तथा स्वागत भाषण डॉ. इरशाद सियानवी ने दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ अरीबा सरफराज द्वारा पवित्र कुरआन के पाठ से हुआ। संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रख्यात आलोचक प्रोफेसर सगीर अफराहीम ने की, जबकि संरक्षक के रूप में प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथियों में अमीर मेहदी (इंग्लैंड), डॉ. कहकशां इरफान तथा डॉ. मुजीब शहज़र शामिल रहे। संचालन गुलाम अब्बास (लखनऊ) ने किया तथा स्वागत भाषण डॉ. इरशाद सियानवी ने दिया।
डॉ. कहकशां इरफान ने अपने वक्तव्य में “अवधनामा” को एक परिवार की संज्ञा देते हुए कहा कि यह केवल एक समाचार-पत्र नहीं, बल्कि भावनात्मक और वैचारिक जुड़ाव का केंद्र था। कोरोना काल में भी इससे जुड़े लोगों ने समर्पण के साथ कार्य किया। अमीर मेहदी ने वकार रिज़वी को “लखनऊ की शान” बताते हुए कहा कि उनके व्यक्तित्व के अवसान से एक बड़ी रिक्तता उत्पन्न हुई है। उन्होंने पत्रकारिता को एक गंभीर और उत्तरदायी कर्म बताते हुए “अवधनामा” से जुड़े लोगों की प्रतिबद्धता की सराहना की। प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि वकार रिज़वी और “अवधनामा” एक-दूसरे के पूरक थे। यह पत्र केवल समाचारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलनों का माध्यम भी बना। उन्होंने इसे लखनवी तहज़ीब का अभिन्न अंग बताया। प्रोफेसर रेशमा परवीन ने वकार रिज़वी को गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक बताते हुए कहा कि उन्होंने “अवधनामा” के माध्यम से समावेशी संस्कृति को सशक्त मंच प्रदान किया। उनके अनुसार यह पत्र प्रेम, सौहार्द और समानता की पाठशाला है, जिसे वकार रिज़वी ने एक मिशन के रूप में जीवित रखा।
इस अवसर पर डॉ. मूसा रज़ा ने “वकार रिज़वी और अवधनामा: एक अध्ययन” विषय पर शोध-पत्र प्रस्तुत किया, जिसमें उनके पत्रकारिक योगदान का विस्तार से विश्लेषण किया गया। डॉ. मुजीब शहज़र ने काव्यात्मक रूप में श्रद्धांजलि अर्पित की। अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रोफेसर सगीर अफराहीम ने कहा कि वकार रिज़वी का व्यक्तित्व बहुआयामी था और उनके जीवन एवं कृतित्व पर उच्च स्तरीय शोध की व्यापक संभावनाएँ हैं। उन्होंने “अवधनामा” को अवध की गंगा-जमुनी संस्कृति का सशक्त दस्तावेज़ बताया तथा नई पीढ़ी से इस दिशा में कार्य करने का आह्वान किया। कार्यक्रम में डॉ. आसिफ अली, डॉ. शादाब अलीम, डॉ. अलका वशिष्ठ, मोहम्मद शमशाद सहित अनेक शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता रही।

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