इकराम चौधरी
नित्य संदेश, मेरठ। आज यहाँ जामिआ गुलज़ार-ए-हुसैनिया अजराड़ा की अज़ीम मस्जिद रियाज़ुल जन्नत में जामिआ के साबिक़ मुहतमिम व सरबराह अलहाज मौलाना हकीम मोहम्मद अब्दुल्लाह मुगीसी रहमतुल्लाह अलैह की वफ़ात-ए-हसरत आयात पर एक ताज़ियती इजलास का एहतेमाम किया गया, जिसमें हज़रत मौलाना मरहूम के लिए इसाले सवाब व दुआए मग़फिरत के साथ ही हजारों की तादाद में कुर्बो जवार और दूर दराज़ से आने वाले आप के तिलामज़ा व मुन्तसबीन, शाख़हाए जामिआ के ज़िम्मेदारान, कदीम व जदीद हुसैनी बिरादरान, मरहूम के खुलफ़ा व मुरीदीन, उलमा व ख़वास ने शिरकत करके मरहूम की ज़िंदगी के हालात व वाक़ियात, तालीमी, तंजीमी और मिल्ली व इस्लाही ख़िदमात, तामीर-ए-मिल्लत के लिए उठाए गए इक़दामात, बैअत व इरशाद, हिल्म व तदब्बुर, हिकमत व दानाई वगैरह महासन व कमालात व दीगर औसाफ-ए-हमीदा पर रोशनी डालते हुए आप की वफ़ात को मिल्लत-ए-इस्लामिया के लिए अज़ीम ख़सारा से ताबीर किया।
सुबह 9 बजे एक घंटा तवील तिलावत व तस्बीहात के अमल से फरागत पर कारी मोहम्मद मेहताब क़ासमी की तिलावत-ए-कलामुल्लाह शरीफ़ से जलसे का आगाज़ हुआ। तम्हीदी कलिमात के दौरान जामिआ के सदरुल मुदर्रिसीन व शैखुल हदीस मौलाना सैयद अकील अहमद क़ासमी ने तमाम हाज़िरीन को मरहूम की रूहानी औलाद बताते हुए कहा कि मौत तो मोमिन के लिए इनाम है, लेकिन हम को जुदाई का ग़म है। उन्होंने अपने और मौलाना गुलज़ार क़ासमी के मरहूम के लिए दायां और बायां बाज़ू बन कर काम करने के हवाले से कहा कि जो जितना ज़्यादा करीब होता है, उसको ग़म भी उतना ही ज़्यादा होता है। उन्होंने खास तौर से हज़रत मरहूम की खुशअख़लाक़ी का ज़िक्र करते हुए आप के जानशीन मौलाना अब्दुलमालिक मुगीसी की भी मुआवनत का अज़्म ज़ाहिर किया।
मौलाना आस मोहम्मद गुलज़ार क़ासमी ने निज़ामत के दौरान हज़रत मरहूम की ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ गोशों को उजागर करते हुए बतौर खास आप की बुलंद अख़लाक़ी, खुशनुमा पेशानी, मेहमान नवाज़ी, आली हिम्मती और हर दौर में हक़ परस्त उलमा की मइयत का तज़किरा किया। मौलाना मोहम्मद इक़बाल क़ासमी ने आबदीदा होकर कहा कि शागिर्दों के साथ ऐसा ताल्लुक़ और मोहब्बत जो हज़रत मौलाना को थी, देखने में नहीं आती। उन्होंने बताया कि बुज़ुर्गों का बिछड़ना छोटों के लिए इब्तिला व आज़माइश का सबब होता है, ऐसे में हमें इस्तेहकाम और उनके मिशन को आगे बढ़ाने की ज़रूरत है।
मौलाना मुईन अख़्तर ख़ां क़ासमी ने हज़रत मरहूम की शफ़क़त व मोहब्बत का तज़किरा करते हुए कहा कि आज “मुईन अख़्तर” कह कर पुकारने वाला चला गया। अब इदारे के रूह-ए-रवां और हज़रत मरहूम के साहिबज़ादों की ज़िम्मेदारी है कि वो उनके जानशीन को भी आगे बढ़ाएं और मौजूदा मुहतमिम की ज़िम्मेदारी है कि इदारे के कुल पुर्ज़ों और ज़िम्मेदारान के साथ एहतराम और हुस्न-ए-सुलूक का मामला करें।
मौलाना कारी अब्दुलवाहिद क़ासमी ने बड़ों के एहतराम और तजुर्बात से फ़ायदा उठाने और उनकी रहनुमाई में आगे बढ़ने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए ताज़ियती अशआर भी पढ़े। मुफ्ती अबू रैहान फ़ारूकी इंदौर ने बताया कि हज़रत मरहूम को अल्लाह ने बेक़्त कई खूबियों और बहुत से कमालात से नवाज़ा था, साथ ही दुआइया अशआर भी पढ़े। मौलाना मोहम्मद सलमान क़ासमी ने ताज़ियती पैग़ाम पढ़कर सुनाया।
मौलाना कारी शफ़ीकुर्रहमान क़ासमी ने मुख़्तलिफ़ तहरीकात के हवाले से हज़रत मरहूम के साथ अपने क़रीबी ताल्लुक़ात का ज़िक्र करते हुए बताया कि वो हर मैदान में नुमायां थे, लेकिन सबसे बड़ी खूबी ये कि हर मिलने वाला खुद को सबसे ज़्यादा क़रीबी महसूस करता था। मुफ्ती रईस अहमद देहरादून ने मरहूम की शफ़क़त व मेहमान नवाज़ी का ज़िक्र करते हुए तक़सीम-ए-कार के साथ उनके छोड़े हुए कामों को आगे बढ़ाने की बात कही।
मौलाना अब्दुलख़ालिक मुगीसी ने कहा कि फ़रमांबरदारी और ख़िदमत व मोहब्बत का हक़ इस इलाक़े ने औलाद से भी ज़्यादा अदा किया। उन्होंने बतौर खास शफ़क़त व खुर्दनवाज़ी का ज़िक्र किया। नदवतुल उलमा लखनऊ के उस्ताद मौलाना ख़ालिद फ़ैसल नदवी ग़ाज़ीपुरी ने शफ़क़त व मोहब्बत और ताल्लुक़ मअल्लाह का ज़िक्र किया।
अलावा अज़ीं मौलाना कारी ज़ियाुर्रहमान क़ासमी हापुड़, मौलाना शहाबुद्दीन क़ासमी खजूरी, मुफ्ती मोहम्मद शहज़ाद क़ासमी मुंडाली, कारी मोहम्मद मोमिन फ़रक़ानी मेरठ, मौलाना दिलशाद अहमद क़ासमी रायधना, अब्दुल माजिद निज़ामी राष्ट्रीय सहारा, मौलाना मोहम्मद अय्यूब क़ासमी मेरठ, मुफ्ती सद्दाम हुसैन क़ासमी किठौर, मुफ्ती मोहम्मद रिज़वान क़ासमी मवाना, मुफ्ती गुलज़ार क़ासमी जामिआ महमूदिया, मौलाना मोहम्मद आरिफ झाड़ौन, मौलाना खुर्शीद अहमद अल-हुसैनी, मोहम्मद यूनुस, मौलाना अब्दुल माजिद मुगीसी, नवाज़िश शाहिद मंज़ूर, मौलाना नवाब अहमद कांधला ने भी शिरकत की।
अख़ीर में हज़रत मरहूम के जानशीन और नवमुन्तख़ब मुहतमिम मौलाना डॉक्टर अब्दुलमालिक मुगीसी ने तमाम हाज़िरीन और ताज़ियत मस्नूना करने वालों का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि दीन-ए-इस्लाम और दीन का ये इदारा अल्लाह की अमानत है। अफ़राद व अश्ख़ास बदलते रहते हैं लेकिन दीन बाक़ी रहता है। ये अल्लाह का मिशन, अंबिया किराम की तहरीक और औलिया अल्लाह का सिलसिला है।
उन्होंने कहा कि यतीम होने का ग़म बुरा है लेकिन इस पर सब्र अल्लाह की मदद का सबब है। उन्होंने अपने वालिद बुज़ुर्गवार की ख़िदमात का तज़किरा करते हुए कहा कि उनका दारुल उलूम, मज़ाहिर उलूम, खानक़ाह रायपुर, नदवतुल उलमा लखनऊ के साथ यकसां ताल्लुक़ था। सब की सरपरस्ती उनको और इस इदारे को हासिल थी। अल्लाह ने उनको मज़जून-ए-मुरक्कब बनाया था। उनकी सबसे बड़ी सिफ़त सब्र व क़नाअत और एहतियात थी। वो इख़्तिलाफ़ात में बीच का रास्ता निकालने की नुमायां ख़ुसूसियत रखते थे। इंसानियत को जोड़ने और तमाम मज़ाहिब को साथ लाने के लिए काम करते थे और यही एतदाल इस्लाम का ख़ास्सा है।
अख़ीर में पठेड़ खानक़ाह के सरबराह सूफ़ी मुईनुद्दीन की इज्तिमाई दुआ व इसाले सवाब के साथ ज़ोहर के वक़्त ये जलसा-ए-ताज़ियत इख़्तिताम पज़ीर हुआ। इस दौरान मेज़बानी के फ़राइज़ अहल-ए-बस्ती ने बड़े ही फ़राख़दिलाना अंदाज़ में अंजाम दिए।
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