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Saturday, April 11, 2026

सीसीएसयू में भारतीय महासागर पर केंद्रित विचार-विमर्श में ‘विकसित भारत’ के लिए सहयोगात्मक विकास पर जोर


नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में “Creating Foresight for Collaborative Growth of India” विषय पर आयोजित महत्वपूर्ण ऑनलाइन विचार-विमर्श का शुभारंभ कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला द्वारा किया गया। कार्यक्रम में भारतीय महासागर क्षेत्र की सामरिक, आर्थिक, पर्यावरणीय एवं तकनीकी संभावनाओं पर गहन मंथन हुआ, जिसमें देश-विदेश के विशेषज्ञों ने भाग लेकर सहयोग, नवाचार और सतत विकास को भारत की प्रगति का आधार बताया।

उद्घाटन अवसर पर कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला ने अपने प्रभावशाली संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में विश्वविद्यालयों की भूमिका अत्यंत व्यापक हो गई है। उन्होंने कहा कि भारतीय महासागर (सागर) जैसे विषय केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आर्थिक, पर्यावरणीय और रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। विश्वविद्यालयों को चाहिए कि वे ऐसे वैश्विक मुद्दों पर शोध, नवाचार और नीति-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं। उन्होंने कहा कि अकादमिक संस्थानों, उद्योग और सरकार के बीच समन्वय स्थापित कर ही समुद्री संसाधनों का सतत उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है, जो “विकसित भारत” के लक्ष्य को सशक्त करेगा। इस अवसर पर वक्ता प्रफुल तलेरा ने भारतीय महासागर के सामरिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसे वैश्विक व्यापार और सुरक्षा का प्रमुख केंद्र बताया। उन्होंने वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों, विशेषकर ईरान-इजराइल जैसे तनावों का उल्लेख करते हुए रणनीतिक तैयारी और दूरदर्शिता की आवश्यकता पर जोर दिया। गुलशन रतन ने ‘ब्लू इकोनॉमी’ की अवधारणा को रेखांकित करते हुए समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग की दिशा में बदलाव की आवश्यकता बताई तथा इस क्षेत्र में शिक्षाविदों की सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया।

डॉ. कमांडर अर्नब दास ने अंडरवाटर डोमेन पर अपने विचार रखते हुए समुद्री सुरक्षा के लिए अंडरवाटर सेंसिंग, विश्लेषण और नियमन की अहमियत बताई। उन्होंने आधुनिक तकनीकों एवं क्षमता निर्माण के माध्यम से समुद्री सुरक्षा, पर्यावरण निगरानी और डिजिटल परिवर्तन को सशक्त बनाने की आवश्यकता जताई। वहीं डॉ. मनोहर राय (घाना)ने समुद्री जल प्रदूषण की गंभीर समस्या पर चिंता व्यक्त करते हुए इसके निराकरण के लिए चल रहे प्रयासों की जानकारी दी और सतत उपाय अपनाने पर बल दिया। संदीप ने भारत की प्रायद्वीपीय तटरेखा से जुड़ी चुनौतियों, विशेषकर मछुआरा समुदाय की समस्याओं को रेखांकित किया, जबकि आलोक कुमार ने तकनीक को सहयोगात्मक विकास का प्रमुख साधन बताते हुए नवाचार और दक्षता बढ़ाने में इसकी भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। संतोष गोयनका ने भारतीय महासागर के माध्यम से लोगों के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक जुड़ाव को रेखांकित करते हुए इसके समृद्ध विरासत पक्ष को सामने रखा।वरिष्ठ विचारक दिलीप परगांवकर ने कहा कि भारतीय महासागर को वैश्विक संपर्क, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण केंद्र बताते हुए जोर दिया कि भारत को इस क्षेत्र में आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण और सामरिक सुरक्षा के बीच संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस शैलेंद्र जायसवाल ने कहा कि आज के समय में अकादमिक ज्ञान को व्यावहारिक अनुभव के साथ जोड़ना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय महासागर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में अनुसंधान, उद्योग और नीति निर्माण के बीच समन्वय स्थापित कर ही प्रभावी और दीर्घकालिक समाधान विकसित किए जा सकते हैं। इस प्रकार के मंच विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और उद्योग जगत के बीच संवाद को सशक्त बनाते हैं, जिससे नवाचार को बढ़ावा मिलता है और देश की प्रगति को नई दिशा मिलती है।

सीसीएसयू के रिसर्च डायरेक्टर प्रो. बीरपाल सिंह ने अपने संबोधन में भारतीय महासागर क्षेत्र में वाटर स्प्लिटेबिलिटी (वॉटर स्प्लिटिंग) की अपार संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यह तकनीक ग्रीन हाइड्रोजन जैसे स्वच्छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के विकास में अहम भूमिका निभा सकती है। समुद्री जल से हाइड्रोजन उत्पादन पर अनुसंधान भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाने के साथ “विकसित भारत” के लक्ष्य को सशक्त करेगा। उन्होंने यह भी बताया कि वॉटर स्प्लिटिंग की प्रक्रिया में ऑक्सीजन के साथ क्लोरीन का उत्सर्जन भी अधिक मात्रा में होता है, जिसे नियंत्रित करने पर विशेष शोध की आवश्यकता है। यदि इस क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार और औद्योगिक सहयोग को बढ़ावा दिया जाए, तो यह न केवल पर्यावरण संरक्षण में सहायक होगा, बल्कि ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में भारत को वैश्विक नेतृत्व की स्थिति में स्थापित कर सकता है।                           

अंत में  कार्यक्रम संयोजक डीन टेक्नोलॉजी प्रोफेसर आरके सोनी ने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए आशा जताई कि इस प्रकार के विचार-विमर्श भविष्य में नीति निर्माण और अनुसंधान को नई दिशा देंगे। उन्होंने कहा कि पॉलिमर का उपयोग भारतीय महासागर क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि उन्नत पॉलिमर सामग्री समुद्री संरचनाओं, जहाज निर्माण, अंडरसी केबल्स की सुरक्षा तथा जंग-रोधी तकनीकों में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही हैं। साथ ही बायोडिग्रेडेबल पॉलिमर समुद्री प्रदूषण को कम करने और ग्रीन टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कार्यक्रम के दौरान प्रोफेसर मृदुल कुमार गुप्ता ,डॉ अनुज कुमार ,डॉक्टर सचिन कुमार ,डॉक्टर योगेंद्र गौतम डॉक्टर नाज़िया तरन्नुम ,इंजी प्रवीण कुमार इत्यादि उपस्थित रहे।

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