नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। कथाव्यास प्रो. सुधाकराचार्य त्रिपाठी ने मयूर विहार में अपने आवास पर सामवेद की पञ्चम कथा में छठे दिन की अद्भुत कथा की। अरण्यपर्व पाँच दशतियों का छोटा सा पर्व है, जिसमें एक एक मन्त्र में कई देवता और कई ऋषि हैं। इसके मन्त्रों में सृष्टि के क्रम का उल्लेख मिलता है। इसमें कहीं उष्णिक् छन्द का व्यतिक्रम भी मिलता है।
ऋषि इन्द्र से प्रार्थना करते हैं कि हमें सबसे प्रशंसनीय गुणों से भर दो। यह याचना नहीं, प्रार्थना है। हे इन्द्र! हम हर काम बलपूर्वक करें, जिससे हमारे यश को पृथ्वी और आकाश में फैलाओ। इन्द्र सबका राजा है , जो देने वाले को देता है, न देने वालों को अलग कर देता है। वरुण उत्तम , मध्यम और अधम का विभाजन करता है। मैं सबसे पहले उत्पन्न हुआ । देवताओं और ऋषियों से पहले उत्पन्न हुआ। मैं अन्न हूँ। जो मुझे देता है मैं उसे देता हूँ। जो किसी को नहीं देता उसे मैं खा जाता हूँ। आज के समय में यह बहुत बड़ी शिक्षा है कि सबके साथ बाँट कर खाओ, दूसरों को दे कर खाओ और आवश्यकता से अधिक मत खाओ। त्रिपाठी जी ने बताया कि पितृ ने गर्भ धारण कराया, इन्द्र ने तृप्त किया, सोम ने शरीर धारण करने की वृत्ति दी, वरुण ने उत्तम, मध्यम और अधम का विभाजन कर पाश में बाँधा।

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