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Tuesday, April 14, 2026

मंज़िल अभी दूर है


नित्य संदेश।
माना कि गांधी के शब्दों पर थे अंबेडकर के कुछ कटाक्ष,
और थे कुछ अलग अल्फ़ाज़ नेहरू के पास मगर;
मगर भाव एक ही था कि—स्वतंत्र और खुशहाल बने अपना देश।
पर अफ़सोस! आज भी दिखता है भेदभाव जाति के नाम पर,
लिए जाते हैं फ़ैसले 'ऊँच-नीच' का गुमान कर।
जिस विष को मिटाने अपनों ने दी थी क़ुर्बानी,
व्यर्थ जाती दिखती है वो, जब इंसान ही न रहा अभिमानी।
उन तीनों का स्वप्न था—शामिल हो नारी भी हर निर्णय में,
कुछ ने पाया भी मुकाम, रचा नया इतिहास है;
पर आज भी अधिकतर का जीवन सिमटा रसोई के नाम है।
वो चाहते थे उज्ज्वल भविष्य, जब शिक्षित होगा युवा देश का;
सौभाग्य उनका कि आज उन्हें देखना नहीं पड़ रहा—नशे में डूबता चेहरा युवा देश का।
बेशक बहुत कुछ पाया है हमने, पर बहुत कुछ पाना शेष है,
जो न कर सको कुछ बड़ा इस देश की उन्नति में, तो बस इतना करना;
ईश्वर ने तुम्हें इंसान बनाया है, तुम इंसानियत की लाज रखना।

✍️स्वर्णिमा शर्मा

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