नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। वाङ्मय कला संगम संस्था के संस्थापक डॉ. विनय कुमार सिंघल 'निश्छल', प्रकाश पुंज, डॉ. राकेश छोकर, डॉ. चन्द्रमणि, डॉ. राकेश कुमार आर्य, शंभु अमिताभ, साहित्यकार संतोष कुमार तिवारी 'हिंदवी', डॉ. वीणा शंकर शर्मा 'चित्रलेखा' एवं अन्य गणमान्य अतिथियों के साथ घर के सुस्वादु भोजन के साथ यह कार्यक्रम संपन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. वीणा शंकर शर्मा 'चित्रलेखा' की मधुर वाणी से सरस्वती वंदना गाकर हुआ।
७ काव्य-संकलन जिनका लोकार्पण हुआ—
१. 'बृहत् कह-मुकरी संसार' डॉ. वीणा शंकर शर्मा,
२. माघ परिमल— सम्पादक डॉ. विनय कुमार सिंघल, सह-सम्पादक शंभु अमिताभ,
३. राग -रंग -रस -गंध- वर्ष
नव— सम्पादक डॉ. विनय कुमार सिंघल 'निश्छल', सह-सम्पादक डॉ. वीणा शंकर शर्मा 'चित्रलेखा', अंजू कालरा दासन 'नलिनी',सुचेता कटारिया,
४. काव्य-ऋतुरोहित— संपादक डॉ. विनय कुमार सिंघल 'निश्छल',
५.अनुभूति— द्वारा डॉ.राकेश छोकर व डॉ. विनय कुमार सिंघल 'निश्छल'
६. Kaleidoscope (collection of English Poems)—by Dr, Vinay Kumar Singhal ji
७. मनोभावों का प्रतिसाद— द्वारा डॉ.यशवंत भंडारी 'यश'
बृहत् कह-मुकरी संसार —एक अद्भुत् कृतिः—
13-14 शताब्दी में खड़ी बोली में काव्य रचना करने वाले अमीर खुसरो ने सर्वप्रथम कह मुकरियां, पहेलियां और दो सगुन लिखे हैं ,उसके बाद आधुनिक काल में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने देश भक्ति परक कहमुकरियां लिखकर इस विधा को पुर्नजीवित किया। इस विधा में बहुत कम लिखा गया जबकि यह विधा बहुत सुन्दर और रोचक है ।आज हमारे सम्मुख एक ऐसा "बृहद कहमुकरी संसार " है, जिसमें 251 कहमुकरियां भिन्न -भिन्न विषयों की समाहित हैं, इस लुप्तप्राय विधा में रचना कर ,लेखिका डॉ. वीणा शंकर शर्मा "चित्रलेखा"ने स्तुत्य प्रयास किया है । हिन्दी साहित्य में यह उनका बहुत बड़ा योगदान है। अद्भुत् कार्यक्रम में साहित्यकार संतोष कुमार तिवारी 'हिन्दवी' जी के दोहों ने चार चाँद लगा दिए l
*अंजू कालरा दासन 'नलिनी'
*डॉ.वीणा शंकर शर्मा 'चित्रलेखा'
*डॉ. विनय कुमार सिंघल 'निश्छल'
विनयशील विनयी "विनय", आयोजक अभिराम।
अभिनंदन यह सृजन का,सबको लगे ललाम।।
विश्वकीर्ति की कीर्ति से, भूषित जिनका नाम।
विनय पूर्ण निश्छल हृदय, करें सृजन अविराम।।
अधिवक्ता वक्ता प्रबल, न्याय-नीति आसीन।
अद्भुत छंद-विधान में, अप्रतिम प्रबल-प्रवीन।।
सजग,सुधी पैनी नजर, उर में भरे उमंग।
पत्रकार साहित्य में, छोकर भरते रंग।।
सृजनशील राकेश जी, करें सदा सहयोग।
आयोजन की भव्यता, इनका सफल प्रयोग।।
चंद्रमणी मानस विमल, लेकर विमल विमर्श।
संचालन उत्कृष्ट अति, श्रोताओं में हर्ष।।
वीणा की झंकार में, कहमुकरी का जोश।
सृजन करें साहित्य का, विधा सहित निर्दोष।।
अंजु मंजु मंजुल हृदय, मृदुल-मृदुल से भाव।
हिन्दी के उत्कर्ष में, रोचक हुआ स्वभाव।।

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