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Thursday, April 2, 2026

सीसीएस यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग में “मोहसिन काकोरवी की शाहकार नात ‘मदह-ए-खैरुल मुरसलीन’” पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित


नित्य संदेश ब्यूरो 
मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के उर्दू विभाग में “मोहसिन काकोरवी की शाहकार नात मदह-ए-खैरुल मुरसलीन” विषय पर एक महत्वपूर्ण ऑनलाइन कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों और आलोचकों ने भाग लिया।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शोधकर्ता एवं आलोचक डॉ. तक़ी आबिदी ने अपने वक्तव्य में कहा कि मोहसिन काकोरवी एक स्वाभाविक (फितरी) शायर थे। उन्होंने मात्र नौ वर्ष की आयु में ही शायरी करना शुरू कर दिया था। उनके लगभग डेढ़ हजार शेर मिलते हैं, लेकिन विशेष बात यह है कि जिस रचना को उन्होंने नात के रूप में एक विशिष्ट साहित्यिक दर्जा दिलाया, वह मदह-ए-खैरुल मुरसलीन है। उन्होंने फारसी में भी शायरी की, और उनके कई क़त्आत फारसी में ही मिलते हैं।

डॉ. आबिदी ने बताया कि यह कसीदा एक शास्त्रीय (क्लासिकल) कसीदा है, जिसमें तशबीब, ग़रीज़, मदह और दुआ जैसे सभी अंग मौजूद हैं। इसमें भारतीय संस्कृति, हिंदू धार्मिक परंपराओं और स्थानीय तत्वों का भी सुंदर समावेश है। उन्होंने यह भी कहा कि मोहसिन काकोरवी में सूफियाना विशेषताएँ थीं और परंपरा के अनुसार उन्हें पैगंबर साहब का स्वप्न में दर्शन हुआ, जिसके बाद उन्होंने यह नात लिखी। “शब्द को रूपक में बदलना” उनका सबसे बड़ा कौशल था।
कार्यक्रम की शुरुआत सईद अहमद सहारनपुरी द्वारा कुरआन-ए-पाक के पाठ से हुई, जबकि फरहत अख्तर ने नात पेश की। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध आलोचक प्रोफेसर सगीर अफराहीम ने की और संरक्षक के रूप में उर्दू विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. इरशाद सियानवी ने किया।

प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि मोहसिन काकोरवी का साहित्य कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल है, इसलिए वे किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। प्रोफेसर रेशमा परवीन ने कहा कि आज के विद्यार्थी क्लासिकल साहित्य से दूर होते जा रहे हैं, इसलिए आवश्यक है कि कसीदा, दास्तान, उपन्यास, कहानी, रुबाई और मसनवी जैसी विधाओं पर भी इसी तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ।

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रोफेसर सगीर अफराहीम ने कहा कि डॉ. तक़ी आबिदी ने कसीदे के पूर्वापर (पृष्ठभूमि और प्रस्तुति) को अत्यंत कलात्मक ढंग से स्पष्ट किया। उन्होंने काशी, मथुरा, गोकुल, वृंदावन, यमुना आदि सांस्कृतिक संदर्भों की व्याख्या की सराहना करते हुए कहा कि यह कार्य केवल एक गहन चिंतक और विद्वान ही कर सकता है।
कार्यक्रम में डॉ. आसिफ अली, डॉ. शादाब अलीम, डॉ. अलका वशिष्ठ, मोहम्मद शमशाद सहित अनेक छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।

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