तरुण आहुजा
नित्य संदेश, मेरठ। शहर में चल रही ध्वस्तीकरण और सीलिंग कार्रवाई को लेकर अब विवाद गहराता जा रहा है। स्थानीय लोगों और व्यापारियों ने परिषद की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
उनका कहना है कि वर्ष 1982 के बायलॉज में 50 वर्ग मीटर तक के प्लॉट पर फ्रंट सेटबैक (न होने) का स्पष्ट प्रावधान है, लेकिन इस महत्वपूर्ण बिंदु को कोर्ट के समक्ष क्यों नहीं रखा जा रहा, यह समझ से परे है। पीड़ितों का आरोप है कि यदि कॉम्प्लेक्स, हॉस्पिटल, स्कूल, जिम सहित अन्य निर्माण अवैध हैं, तो कार्रवाई सभी पर समान रूप से होनी चाहिए। लेकिन वर्तमान स्थिति में भेदभाव के आरोप लग रहे हैं—कहीं सिर्फ नोटिस देकर औपचारिकता पूरी की जा रही है, तो कहीं नोटिस लगते ही तुरंत सीलिंग और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई कर दी जा रही है।
स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ स्थानों पर लाल निशान लगाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई, जबकि अन्य जगहों पर बिना पर्याप्त समय दिए कठोर कदम उठाए गए। इससे प्रशासन की मंशा और कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि करीब 35 साल पुराने मकानों को भी कार्रवाई के दायरे में लाया जा रहा है, जिससे लोगों में भय और आक्रोश का माहौल है।
मांग:
लोगों ने निष्पक्ष जांच और एक समान कार्रवाई की मांग करते हुए कहा है कि केवल खानापूर्ति करने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कदम उठाए जाने चाहिए, ताकि न्यायसंगत व्यवस्था कायम हो सके।
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