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Wednesday, April 15, 2026

RJD से CM तक, सम्राट चौधरी जैसे बागी ने कैसे भाजपा की नींव हिला दी...


विभूति रस्तोगी 
नित्य संदेश, नई दिल्ली। आज बिहार की राजनीति का वो दिन है, जिसने दशकों पुराना इतिहास बदल दिया है। 1 अणे मार्ग का पता वही है, लेकिन नेमप्लेट बदलने वाली है। भाजपा ने आखिरकार बिहार की कमान उस शख्स के हाथ में सौंप दी है, जिसका राजनीतिक डीएनए 'बगावत' और 'पावर' से बना है। भाजपा ने मुख्यमंत्री के तौर पर हमेशा ऐसे लोगों को चुना है जो संगठन की गहराइयों से निकले और लाइमलाइट से दूर थे।

लेकिन बिहार में कहानी अलग है। यहाँ भाजपा को एक ऐसे नेता के सामने 'सरेंडर' करना पड़ा, जिसका राजनीतिक इतिहास राजद और जदयू से जुड़ा रहा है। यह भाजपा के उस पारंपरिक सांचे को तोड़ता है जहाँ 'विचारधारा' और 'आरएसएस बैकग्राउंड' को सर्वोपरि रखा जाता था।

सम्राट चौधरी का सफर भाजपा के कैडर या RSS की शाखाओं से शुरू नहीं हुआ। उन्होंने राजनीति का ककहरा लालू प्रसाद यादव की RJD में सीखा। उनके पिता शकुनी चौधरी लालू के सबसे भरोसेमंद साथी थे। 1999 में राजद सरकार में मंत्री बनने से लेकर, पार्टी में 'चीफ व्हिप' रहने तक, सम्राट का पूरा वैचारिक आधार उस राजनीति पर टिका था, जिसका भाजपा विरोध करती आई है।

किसी बाहरी नेता के लिए भाजपा जैसी कैडर-आधारित पार्टी में अपनी जगह बनाना ही मुश्किल होता है, लेकिन सम्राट ने जो किया है, वो किसी चमत्कार से कम नहीं है। राजनीति में शुरुआत ही विवादों से भरी रही थी। साल 1999 में रबड़ी देवी सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री बने लेकिन आरोप लगा कि मंत्री बनने के वक्त सम्राट की उम्र संवैधानिक सीमा से कम थी। बवाल इतना बढ़ा कि उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन इस घटना ने बिहार को बता दिया था कि एक नया खिलाड़ी मैदान में आ चुका है।

सम्राट को समझ आ गया था कि राजनीति में ठहरना हारने जैसा है। फरवरी 2014 में उन्होंने राजद के 13 विधायकों के साथ ऐसी बगावत की कि लालू यादव का किला ढह गया। वे फिर JDU में आए, नीतीश कुमार के साथ बैठे, और जब जीतन राम मांझी सीएम बने, तो उनके कैबिनेट में भी मंत्री रहे।

यहाँ सम्राट ने खुद को एक कुशल स्ट्रैटेजिस्ट के रूप में स्थापित किया। उन्होंने दिखाया कि वे सिर्फ विधायक नहीं, बल्कि 'सरकार बनाने और बिगाड़ने' की ताकत रखते हैं।

इसके बाद आया साल 2018, जब सम्राट ने भाजपा की सदस्यता ली और मात्र 8 साल के भीतर उपमुख्यमंत्री से होते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँच गए।

साल 2018 में सम्राट चौधरी ने भगवा चोला ओढ़ा। इस वक्त भाजपा को बिहार में एक ऐसे आक्रामक पिछड़ा वर्ग के नेता की तलाश थी जो दोनों पार्टियों, राजद और जदयू पर सीधा प्रहार कर सके। और फिर शुरू हुआ प्रमोशन का वो दौर, जो भाजपा के इतिहास में विरला ही दिखता है।

2019: प्रदेश उपाध्यक्ष
2020: एमएलसी और फिर पंचायती राज मंत्री
2022: विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष
2023: बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष
2024: उपमुख्यमंत्री और विधायक दल के नेता
आज: बिहार के मुख्यमंत्री

यह घटनाक्रम दिखाता है कि सम्राट चौधरी ने अपनी ताकत और उपयोगिता को इस कदर साबित किया कि भाजपा के आलाकमान को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ी। यह सम्राट की उस राजनीतिक जमीन की ताकत है, जिसे भाजपा नकार नहीं सकी। उन्होंने साबित किया कि बिहार में भाजपा को अगर जीतना है, तो उसे 'बाहर से आए' इस बागी तेवर वाले नेता की जरूरत है।

सम्राट चौधरी का सफर विवादों से भी घिरा रहा। कभी उनके नाम राकेश कुमार को लेकर विरोधियों ने घेरा, तो कभी उनकी आक्रामकता पर सवाल उठे। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी उनकी 'पगड़ी'। उन्होंने कसम खाई थी कि जब तक नीतीश को सीएम पद से नहीं हटाएंगे, पगड़ी नहीं खोलेंगे। आज भले ही परिस्थितियां बदल गई हों, लेकिन सम्राट का संकल्प उन्हें कुर्सी तक ले आया।

सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना इस बात का सबूत है कि अब भाजपा बिहार में 'बैकफुट' पर नहीं खेलना चाहती। उनकी पगड़ी यानी 'मुरैठा' सिर्फ एक संकल्प नहीं था, बल्कि नीतीश कुमार और लालू यादव के खिलाफ भाजपा का सबसे बड़ा हथियार था।

बिहार की राजनीति अब एक नए ध्रुव पर खड़ी है। जहाँ विचारधारा से ज्यादा 'शक्ति' और 'परिणाम' को प्राथमिकता दी गई है। सम्राट का राज शुरू हो चुका है, और चुनौतियां भी।

क्या सम्राट चौधरी भाजपा के सबसे सफल प्रयोग साबित होंगे? आप भी अपनी राय कमेंट कर हमें जरूर बताइए।

सोर्स: पहली वार्ता

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