आधिकारिक घोषणा के अनुसार, इस दिव्य सिंहस्थ महाकुंभ आयोजन 27 मार्च 2028 से प्रारंभ होकर 27 मई 2028 तक, यानी पूरे दो महीने की लंबी अवधि तक चलेगा। शिप्रा के तट पर आयोजित होने वाला यह सिंहस्थ महाकुंभ न केवल भारत की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत स्वरूप होगा, बल्कि मानवता और श्रद्धा का एक अद्भुत संगम भी बनेगा।
इस सिंहस्थ महाकुंभ की पवित्रता का मुख्य आधार 'शाही स्नान' और 'पर्व स्नान' हैं। श्रद्धालुओं के लिए 9 अप्रैल से 8 मई 2028 के बीच तीन महत्वपूर्ण शाही स्नान के साथ-साथ कई अन्य पर्व स्नान प्रस्तावित किए गए हैं। इस दौरान मोक्षदायिनी शिप्रा के घाटों पर 13 अखाड़े से लाखों साधु-संतों और भक्तों की उपस्थिति का अनुपम दृश्य देखने को मिलेगा। सरकार ने इस आयोजन को वैश्विक मानकों के अनुरूप भव्य और सुरक्षित बनाने के लिए अभी से ही कमर कस ली है। बुनियादी ढांचे के विकास, अत्याधुनिक यातायात प्रबंधन, घाटों के विस्तार और श्रद्धालुओं के लिए सर्वोत्तम सुविधाओं के निर्माण पर विशेष जोर दिया जा रहा है। अनुमानों के अनुसार, इस बार लगभग 14 से 15 करोड़ से अधिक श्रद्धालु श्री महाकाल के दर्शन और पवित्र डुबकी के लिए उज्जैन पहुंचेंगे।
शाही स्नान (अमृत स्नान) की तय तिथियां:-
शाही स्नान के विशेष अवसर पर अखाड़ों के संत और साधु-महात्मा पूरे ठाठ-बाट के साथ शिप्रा नदी में पुण्य डुबकी लगाते हैं। इनकी प्रमुख तिथियां इस प्रकार हैं:
9 अप्रैल 2028 - चैत्र पूर्णिमा और हनुमान जयंती का पावन पर्व।
27 अप्रैल 2028 - अक्षय तृतीया का विशेष मुहूर्त।
8 मई 2028 - वैशाख पूर्णिमा और बुद्ध पूर्णिमा।
प्रमुख पर्व स्नान की तिथियां और त्योहार:-
शाही स्नान के अतिरिक्त, महाकुंभ के दौरान अन्य शुभ तिथियों पर भी श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं, जिनका विवरण इस प्रकार है:-
13 अप्रैल 2028 - मेष संक्रांति।
20 अप्रैल 2028 - वरुथिनी एकादशी।
1 मई 2028 - गंगा सप्तमी।
3 मई 2028 - सीता नवमी।
5 मई 2028 - मोहिनी एकादशी।
7 मई 2028 - नृसिंह जयंती।
उज्जैन का यह सिंहस्थ महाकुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति, साधु-संतों के समागम और आध्यात्मिकता का एक ऐसा केंद्र है, जो संपूर्ण विश्व को शांति और एकता का संदेश देता है। 62 दिनों का यह दिव्य उत्सव श्री महाकाल की नगरी को एक नई ऊर्जा से भर देगा और आने वाले समय में विश्व पटल पर भारत की अमिट छाप छोड़ेगा। यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि सांस्कृतिक और वैश्विक स्तर पर भी भारत के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।


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