अमर चौहान
नित्य संदेश, मेरठ। उत्तर प्रदेश में शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए पाठ्यपुस्तकों को लेकर स्कूलों, अभिभावकों और पुस्तक बाजार में असमंजस की स्थिति बन गई है। हालिया रिपोर्ट्स के बाद धारणा तेजी से फैली है कि यूपी बोर्ड से संबद्ध स्कूलों में सरकारी/बोर्ड की पुस्तकों के अलावा निजी प्रकाशकों की किताबें लगाने पर कार्रवाई हो सकती है। कई जगह यह भी चर्चा है कि निजी किताबें पाए जाने पर स्कूल की मान्यता समाप्त करने या पाँच लाख रुपये तक जुर्माना लगाने जैसी कार्रवाई की जा सकती है।
इसका असर स्कूलों में साफ दिखाई दे रहा है। कई विद्यालयों में किताबों के चयन और खरीद प्रक्रिया पर रोक लग गई है। शिक्षा से जुड़े लोगों के अनुसार, बड़ी संख्या में स्कूल वर्षों से बोर्ड की मुख्य पुस्तकों के साथ निजी प्रकाशकों की रेफरेंस बुक्स, अभ्यास पुस्तिकाएँ और वर्कबुक्स भी पढ़ाते रहे हैं, क्योंकि ये बच्चों की समझ बढ़ाने और परीक्षा की तैयारी मजबूत करने में मदद करती हैं। स्कूल प्रबंधन का कहना है कि वे आज भी निजी प्रकाशकों की किताबें अपने विद्यालय में चलाना चाहते हैं, लेकिन मौजूदा माहौल में वे असमंजस और डर में हैं। कई स्कूलों ने किताबों की सूची तैयार होने के बावजूद उसे जारी नहीं किया है, क्योंकि उन्हें आशंका है कि बाद में किसी प्रकार की कार्रवाई या दबाव का सामना न करना पड़े।
वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कहीं एम०आर०पी० से अधिक कीमत लेना, जबरदस्ती किताब बिकवाना या नकली/पायरेटेड किताबें बेचने जैसी गलत गतिविधियाँ हों, तो उस पर कार्रवाई उचित है, लेकिन गलत गतिविधियों के नाम पर पूरे निजी प्रकाशन जगत को संदेह की दृष्टि से देखना और स्कूलों में डर का माहौल बनना शिक्षा के हित में ठीक नहीं है। शिक्षाविदों का कहना है कि इस विषय पर शीघ्र स्पष्टता जरूरी है, ताकि स्कूलों को विकल्प और स्वतंत्रता मिल सके और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो।

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