नित्य संदेश।
आज के दौर में अगर हम पीछे मुड़कर देखें, तो एक अजीब विरोधाभास नजर आता है। वह दौर जब जीवन में संघर्ष ज्यादा था, तब रिश्तों में मिठास और गर्माहट थी। आज जीवन 'स्मार्ट' हो गया है, सुविधाएं उंगलियों पर हैं, लेकिन रिश्तों की वह सहजता कहीं खो गई है। सच तो यह है कि तब जीवन आसान नहीं था, पर उसमें 'जीवन' था; आज जीवन सरल बहुत है, पर वह सिर्फ एक व्यवस्था बनकर रह गया है।
एक समय था जब अपनों का हाल जानने के लिए मीलों का सफर पैदल तय करना पड़ता था। थकावट होती थी, लेकिन मिलने की तड़प उस थकान पर भारी पड़ती थी। आज हमारे पास तेज रफ्तार गाड़ियां हैं, वीडियो कॉल की सुविधा है, लेकिन संवाद का आधार 'जरूरत' बन गया है। अब फोन कॉल करने से पहले अक्सर यह गणित लगाया जाता है कि वह व्यक्ति भविष्य में हमारे किस काम आ सकता है। स्वार्थ की इस कतरन ने निस्वार्थ प्रेम के कपड़े को तार-तार कर दिया है।
विवाह या अन्य शुभ अवसरों पर जाना पहले एक सामाजिक और पारिवारिक उत्तरदायित्व माना जाता था। चाहे रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो, अपनों के बीच उपस्थिति अनिवार्य थी। आज के डिजिटल युग में, यदि सामने वाला हमारे 'काम' का नहीं है, तो हम सशरीर वहां जाने के बजाय UPI कर देना ज्यादा उचित समझते हैं। हमने उपस्थिति का विकल्प पैसों से ढूंढ लिया है, लेकिन हम यह भूल गए कि सुख-दुख में खड़ा होना एक अहसास है, जिसे कोई डिजिटल ट्रांजेक्शन पूरा नहीं कर सकता।
आज भी हमारे घर के बुजुर्ग इस बात पर जोर देते हैं कि 'जिए-मारे' (सुख-दुख) में शामिल होना जरूरी है। वे जानते हैं कि परिवार का एक भी सदस्य अगर वहां पहुंचता है, तो वह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे परिवार के स्नेह का प्रतिनिधित्व करता है। उनके लिए रिश्तों की कीमत सुविधाओं से कहीं बढ़कर है। यह सोचने का विषय है कि हम जिस सुख-सुविधा को अपने परिवार और अपनों के लिए जुटा रहे हैं, क्या वही सुविधाएं हमें उनसे दूर तो नहीं कर रहीं? हम एक ऐसे मुकाम की ओर भाग रहे हैं जहाँ हमारे पास सब कुछ होगा, सिवाय अपनों के साथ बिताए उन पलों के जिनमें दिखावा नहीं, बल्कि आत्मीयता थी। समय रहते यह समझना जरूरी है कि मशीनें जीवन सरल बना सकती हैं, लेकिन जीवन का अर्थ केवल भावनाओं और आपसी मेलजोल से ही पूर्ण होता है।
🖊️ स्वर्णिमा शर्मा
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