नित्य संदेश। बोर्ड परीक्षाओं के समय बच्चों के मन में भय और दबाव स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। ऐसे में परीक्षा को सही दृष्टिकोण से समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। परीक्षा एक कला है। कला का परिमार्जन करने के लिए परिश्रम, निरंतर अभ्यास और सकारात्मक सोच बेहद आवश्यक है। अपनी साधना को साकार करने का माध्यम परीक्षा ही है। परीक्षा बहुत भारी चीज नहीं है जिसके काल्पनिक भार से परीक्षार्थी परेशान हो जाते हैं। कक्षा में सतर्कता और अपने समय के प्रति सजग रहने वाला परीक्षार्थी बोर्ड की परीक्षाओं में असफल हो ही नहीं सकता। वहीं परीक्षार्थी असफल होते हैं जो अपने आत्मविश्वास को बहुत नीचे गिरा देते हैं।
दरअसल, ज्यादा नंबर लाने का सामाजिक दबाव बच्चों को तनावग्रस्त बनाता है। कम नंबर लाना किसी बच्चे के कमजोर होने को साबित नहीं करता। यह परीक्षा प्रणाली की अपनी सीमा भी हो सकती है। बच्चों में अनंत संभावनाएं होती हैं जबकि मूल्यांकन की प्रणालियों की सीमाएं होती हैं। इसलिए मात्र अंकों के आधार पर बच्चों का मूल्यांकन करना एकांगी दृष्टिकोण है। बच्चों को केवल अंकों के आधार पर आंकना उनके जीवन के साथ खिलवाड़ करने के बराबर है। अंक ही पूरा जीवन नहीं है।
बच्चे का जीवन उसका आत्मविश्वास है। उसकी रचनात्मकता है। उसके भीतर सीखने की जिज्ञासा की प्रकृति है। सीखने के साथ-साथ अपने जीवन में बदलाव लाने का साहस है। समाज के साथ तालमेल मिलाकर चलने का कौशल अर्जित करना भी जीवन की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इसके साथ ही बच्चे में अच्छे नागरिक बनने के सभी मूल्य मौजूद होना आवश्यक है। अतः परीक्षा साधना का उत्सव है, जिसमें सकारात्मक विचार, आत्मविश्वास और धैर्य की आवश्यकता होती है। उन सभी बच्चों को शुभकामनाएं, जो बोर्ड की परीक्षा में बैठने जा रहे हैं। ध्यान रखें, धैर्य सभी संकटों का एकमात्र सहारा होता है।
( लेखक साहित्यकार और शिक्षाविद हैं )

No comments:
Post a Comment