नित्य संदेश। भारत के लिए बजट केवल अर्थव्यवस्था का बही-खाता नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्राथमिकताओं का जीवंत दर्पण है। वर्ष 2026 का केंद्रीय बजट विकसित भारत के वृहद स्वप्न और आम आदमी की बुनियादी जरूरतों के बीच एक संतुलन साधने का सराहनीय प्रयास करता दिखाई दे रहा है। एक ओर जहां कैंसर की दवाओं और गैजेट्स पर शुल्क घटाकर सरकार ने आमजन को सीधे तौर पर राहत के द्वार खोले हैं, वहीं दूसरी ओर बुनियादी ढांचे पर भारी निवेश के जरिए भविष्य की सुदृढ़ नींव रखने का साहस दिखाया है। कड़े आर्थिक फैसलों और लोक-कल्याणकारी योजनाओं के बीच ऐसा सटीक सामंजस्य बिठाना सरकार की परिपक्व सोच और दूरदर्शी नेतृत्व का परिचायक है।
विकास के दो मजबूत स्तंभ कृषि और शिक्षा हैं। बजट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़, यानी कृषि को समर्पित है। डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (डीपीआई) के माध्यम से किसानों को तकनीक से जोड़ना और प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन देना मिट्टी की सेहत और किसान की जेब, दोनों के लिए शुभ संकेत है। हालांकि, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और खाद सब्सिडी जैसे विषयों पर किसानों की अपेक्षाएं हमेशा ऊंची रहती हैं, जिनका समाधान ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था में तरलता ला पाएगा।
शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में निवेश यह दर्शाता है कि सरकार डेमोग्राफिक डिविडेंड का लाभ उठाने को आतुर है। नई शिक्षा नीति के अनुरूप शोध और नवाचार पर जोर देना युवाओं को केवल डिग्री धारक नहीं, बल्कि रोजगार प्रदाता बनाने की दिशा में एक कदम है। उच्च शिक्षा के लिए ऋण प्रक्रियाओं का सरलीकरण मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए सपनों की उड़ान को आसान बनाएगा। अंत्योदय के संकल्प को चरितार्थ करते हुए सरकार ने जिस तरह हाशिए पर खड़े व्यक्ति को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया है, वह आधुनिक भारत के समावेशी विकास की दिशा में एक अत्यंत प्रशंसनीय कदम है।
इस बजट के व्यापक प्रभाव होंगे और चुनौतियां भी हैं। नौकरीपेशा वर्ग के लिए मानक कटौती (स्टैंडर्ड डिडक्शन) में वृद्धि महंगाई के इस दौर में एक सुखद मरहम की तरह है, लेकिन असली चुनौती मध्यम वर्ग की उस उम्मीद को अक्षुण्ण बनाए रखने की है जो पुरानी कर व्यवस्था के लाभों को धीरे-धीरे ओझल होते देख रही है। इसी के साथ, मेक इन इंडिया और एमएसएमई को दिया गया प्रोत्साहन दूरगामी परिणाम देने वाला है, क्योंकि किसी भी राष्ट्र की आर्थिक उन्नति तभी पूर्णता पाती है जब उसका स्थानीय बाजार वैश्विक मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की क्षमता रखे।
बजट की वास्तविक सफलता अंततः इसके कार्यान्वयन के शिल्प पर ही निर्भर करेगी। वित्तीय आंकड़े जब सरकारी फाइलों के घेरे से बाहर निकलकर आम गृहिणी की रसोई के चूल्हे, किसान के खलिहान और युवाओं के हाथ के हुनर में तब्दील होंगे, तभी इस आर्थिक दस्तावेज का वास्तविक उत्सव मनाया जा सकेगा। वैसे यह बजट राहत से रियायत वाला है पर आंकड़ों के विशाल आकाश को आम आदमी की यथार्थ वाली जमीन से जोड़ना ही वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है, ताकि विकास का लाभ अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक निर्बाध रूप से पहुंच सके।
सपना सीपी साहू
संपादिका, मध्य प्रदेश

No comments:
Post a Comment