नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। जैन गुरु प्रतीक सागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि आचार्य कुदंकुदं देव ने श्रमण व श्रावकों के लिए अलग-अलग संविधान बनाया है, मुनियों के लिए प्रतिक्रमण स्तंवन वंदना तथा श्रावकों के लिए देव पूजा, गुरु उपस्ति, स्वाध्याय, संयम, तप, दान और जो जो दो कार्य श्रमण व श्रावकों के लिए ज्यादा जरूरी व आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि साधुओं के लिए ज्ञान और ध्यान तथा श्रावकों के लिए दान और पूजा है, स्वाध्याय भी प्रत्येक श्रावक को रोजाना करना चाहिए, इससे राग द्वेष कषाय क्षीण होते है. 16 कारण भावनाओं में अरिहंत भक्ति और सिद्ध भक्ति है। शरीर की शक्ति नहीं मन की शक्ति को बढाए, जो मन से मजबूत होते है, वही धर्म का परचम लहराते है। इस मौके पर प्रवक्ता सुनील जैन, विनय जैन, प्रदीप, वीरेंद्र जैन, अनिल चेतन जैन आदि मैजूद रहें।
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