नित्य संदेश। छिंदवाड़ा में बच्चों की दर्दनाक मौतें, जो कथित रूप से कोल्ड्रिफ खांसी की दवा (Coldrif Syrup) के सेवन से हुईं, पूरे देश को झकझोर देने वाली घटना है। हर बच्चे की मौत मानवता के लिए एक गहरी चोट है।
हम, चिकित्सक समुदाय के सदस्य के रूप में, इस दुख में परिवारों के साथ हैं। लेकिन इस घटना के बाद छिंदवाड़ा के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण सोनी की गिरफ्तारी ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या वास्तव में डॉक्टर दोषी हैं या उन्हें प्रशासनिक असफलता का बलि का बकरा बनाया जा रहा है?
वास्तविक जिम्मेदारी किसकी है?
डॉ. सोनी ने न तो यह सिरप बनाया, न सप्लाई किया, और न ही उसकी गुणवत्ता की जांच करने की कोई जिम्मेदारी उनकी थी। उन्होंने तो केवल एक मान्यता प्राप्त और बाज़ार में उपलब्ध दवा को मरीज के इलाज के लिए लिखा था —
जिसे ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) द्वारा स्वीकृति प्राप्त थी। यदि सिरप में डायथिलीन ग्लाइकोल (DEG) जैसे ज़हरीले रसायन की मिलावट पाई गई है, तो इसकी जिम्मेदारी निम्न पर जाती है –
* निर्माता कंपनी पर जिसने दूषित या घटिया रसायन का उपयोग किया।
* डीसीजीआई (DCGI) पर जिसने निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण में लापरवाही की।
* मध्यप्रदेश और तमिलनाडु के औषधि नियंत्रक विभागों पर जिन्होंने समय रहते दवा की जांच नहीं की।
यह सिस्टम की विफलता है, डॉक्टर की नहीं, यह घटना किसी डॉक्टर की गलती नहीं, बल्कि दवा नियंत्रण व्यवस्था की असफलता को दर्शाती है। भारत के डॉक्टर सरकार द्वारा स्वीकृत दवाओं पर भरोसा करते हैं। अगर दवा पहले से ही फैक्ट्री या डिस्ट्रीब्यूशन स्तर पर दूषित हो चुकी हो, तो
कोई भी डॉक्टर — चाहे वह कितना भी अनुभवी क्यों न हो उसे जांच नहीं सकता। डॉक्टरों को दोषी ठहराना, असली अपराधियों से ध्यान भटकाने के समान है। हम डॉ. प्रवीण सोनी की गिरफ्तारी की कड़ी निंदा करते हैं
नेशनल यूनाइटेड फ्रंट ऑफ डॉक्टर्स (NUFD) इस गिरफ्तारी की कड़े शब्दों में निंदा करता है और मांग करता है –
1. डॉ. प्रवीण सोनी को तुरंत और बिना शर्त रिहा किया जाए।
2. इस पूरे सिरप प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
3. निर्माता कंपनी और जिम्मेदार औषधि नियंत्रण अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।
4. डॉक्टरों को मनमाने कानूनी उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान की जाए।
डॉक्टर अपराधी नहीं, जीवनदाता हैं। डॉक्टर अपने जीवन को मरीजों की सेवा और उनके जीवन की रक्षा के लिए समर्पित करते हैं। ऐसे में किसी डॉक्टर को इसलिए जेल भेजना कि उसने एक सरकारी रूप से स्वीकृत दवा लिखी, ना केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि पूरे चिकित्सा समुदाय का मनोबल तोड़ने वाला कदम है।
हम मध्यप्रदेश सरकार, केंद्र सरकार और डीसीजीआई से अपील करते हैं कि वे निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ जांच करें। सत्य सामने आए और न्याय मिले —
निर्दोष डॉक्टरों को भी, और उन परिवारों को भी जिन्होंने अपने बच्चों को खोया है।
प्रस्तुति
डॉ. अनिल नौसरान
संस्थापक
नेशनल यूनाइटेड फ्रंट ऑफ डॉक्टर्स (NUFD)
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