नित्य संदेश। आज उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षक आंदोलनरत हैं। कारण यह है कि सरकार ने सभी के लिए टीईटी परीक्षा अनिवार्य कर दी है। इस निर्णय से बहुत से शिक्षक घबराए हुए हैं। लेकिन क्या यह उचित है कि जो शिक्षक स्वयं परीक्षा से डर जाए, वह बच्चों को आत्मविश्वास और ज्ञान का पाठ पढ़ा सके?
शिक्षक केवल नौकरी नहीं करते, वे राष्ट्र निर्माण की नींव रखते हैं। बच्चों के जीवन की दिशा वही तय करते हैं। ऐसे में अगर शिक्षक खुद ही यह कहें कि "हमसे परीक्षा मत लो," तो यह विद्यार्थियों के मन में कैसा संदेश जाएगा? वास्तव में, इस आंदोलन के बजाय अगर शिक्षक दो-तीन महीने पढ़ाई करके परीक्षा देंगे, तो न केवल उनका ज्ञान बढ़ेगा बल्कि आत्मविश्वास भी मजबूत होगा। यह बच्चों को भी प्रेरणा देगा कि सीखने और परखने से कभी डरना नहीं चाहिए।
परीक्षा केवल अंक प्राप्त करने का साधन नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन का अवसर है—यह जानने का कि हम कहां खड़े हैं और हमें कितना और आगे बढ़ना है। अगर शिक्षक स्वयं इस कसौटी से गुजरेंगे, तो वे विद्यार्थियों के सामने एक जीवंत उदाहरण बनेंगे। जो शिक्षक परीक्षा देने के लिए तैयार नहीं हैं, उनके लिए यह सोचने का समय है कि क्या वे इस पवित्र पेशे में बने रहने के योग्य हैं। ऐसे लोगों को गरिमा के साथ **स्वेच्छा से सेवानिवृत्ति** ले लेनी चाहिए, ताकि केवल योग्य, समर्पित और प्रेरणादायी शिक्षक ही भविष्य की पीढ़ी को मार्गदर्शन दे सकें।
बेसिक शिक्षा केवल बच्चों को अक्षरज्ञान नहीं देती, बल्कि यह राष्ट्र के चरित्र और भविष्य की आधारशिला है। अगर यह नींव कमजोर होगी तो ऊँची से ऊँची इमारत भी कभी टिक नहीं पाएगी। इसलिए आवश्यकता है कि शिक्षक खुद को इस कसौटी पर परखें और समाज को यह संदेश दें कि "हम स्वयं भी सीखते हैं, स्वयं भी परखते हैं और अपने विद्यार्थियों को भी यही शिक्षा देते हैं।"
प्रस्तुति
प्रोफेसर डॉ. अनिल नौसरान
वरिष्ठ पैथोलॉजिस्ट, मेरठ
No comments:
Post a Comment