पौधों की स्थानीय प्रजातियों को विशेष रूप से किया जा रहा रोपित
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। जापानी वनस्पति शास्त्री डॉ० अकीरा मियावाकी ने 1970 के दशक में मियावाकी पद्धति को विकसित किया। यह विधि शहरीकरण से नष्ट एवं प्राकृतिक वनों को बहाल करने और कम जगह में तेजी से घने एवं हरे जंगल उगाने के लिये अपनायी जाती है। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन एवं अत्यधिक शहरीकरण के चलते मियावाकी पद्धति द्वारा विकसित किये गये वन तेजी से बढ़ते हैं एवं जलवायु परिवर्तन की समस्या से लड़ने के लिये एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मियावाकी पद्धति के तहत छोटे, शहरी स्थानों में घने, बहुस्तरीय और आत्मनिर्भर वनों का निर्माण पारम्परिक तरीकों की तुलना में 10 गुना अधिक तेजी से तैयार किया जा सकता है जिसमें देशी वृक्ष प्रजातियों का उच्च घनत्व, मृदा संवर्धन एवं मल्चिंग का उपयोग किया जाता है। मियावाकी पद्धति के प्रमुख चरणों में कार्बनिक पदार्थों के साथ मिट्टी तैयार करना जिसमें विभिन्न जैविक खाद जैसे- गोबर की खाद, वर्मिकम्पोस्ट आदि वैधन सामग्री जैसे चावल की भूसी, गेहूँ की भूसी आदि, जलधारक जैसे- नारियल के रेशे एवं पीट को उपयोग में लाया जाता है। इस पद्धति में पेड़ों की कुल संख्या का 40 से 50 प्रतिशत आसपास के क्षेत्र में सबसे अधिक पायी जाने वाली प्रजातियों को शामिल करना चाहिये एवं कम से कम 3 से 5 अलग-2 प्रजातियों का चयन करना चाहिये। कुछ कम सामान्य रूप से पायी जाने वाली देशी प्रजातियाँ सहायक पौधों के रूप में 25 से 40 प्रतिशत तक हो सकती हैं एवं अन्त में कुछ अन्य छोटी प्रजातियाँ शेष वन का निर्माण करती हैं। इन छोटी प्रजातियों की न्यूनतम ऊँचाई 60 से 80 सेंटीमीटर होनी चाहिये।
बहुस्तरीय वन बनाने के लिये विभिन्न देशी प्रजातियों का चयन करना, प्रति वर्ग मीटर में तीन से पाँच पौधों की सघनता से पौधारोपण करना तथा स्थल को गीली घास की मोटी परत से ढ़कना शामिल है। उचित रखरखाव में पौधे 3 से 5 वर्षों के भीतर आत्मनिर्भर हो जाते हैं। जमीन की तैयारी के लिये मिट्टी से खरपतवार एवं ईंट-पत्थर निकाल देने चाहियें। वनीकरण शुरू करने के लिये इसे दिन में कम से कम 8-9 घण्टे के लिये धूप उपलब्ध होनी चाहिये। सिंचाई की सुविधा को भी सुनिश्चित कर लेना चाहिये। वृक्षारोपण प्रक्रिया के शुरूआत में चयनित स्थान की मिट्टी में में छोटे-2 छोटे- गढ्ढ़ों को खोदकर जिनकी गहराई 0.5 से 1 मीटर (पौधे की प्रजाति पर निर्भर) हो, पौधारोपण की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। नाजुक पौधों की सहायता के लिये उचित सहायक डंडियाँ भी लगायी जा सकती हैं।
वन की देखभाल प्रारम्भिक 2-3 वर्षों के लिये आवश्यक है जिसमें मुख्य रूप से सिंचाई करना एवं खरपतवार नियन्त्रण करना शामिल है। इसके बाद परितन्त्र आत्मनिर्भर हो जाता है। आम तौर पर जंगलों को पारम्परिक विधि से उगाने में कम से कम 100 वर्ष का समय लगता है जबकि मियावाकी पद्धति से उन्हें केवल 20 से 25 वर्षों में उगाया जा सकता है।
वर्तमान समय में पूरा विश्व पर्यावरणीय संकट से जूझ रहा है। इस समय में मियावाकी पद्धति से विकसित किये गये वन इस समस्या से निदान के लिये अत्यधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं, यह पद्धति शहरों के लिये तो वरदान साबित हो सकती है। शहरों में खाली पड़े छोटे स्थानों को इस पद्धति द्वारा वनों में बदला जा सकता है। मियावाकी पद्धति द्वारा कम समय में अधिक वृक्ष प्रति इकाई क्षेत्रफल पर रोपित किया जा सकता है जिससे हवा, पानी, शोर और मिट्टी के प्रदूषण को नियन्त्रित करने में मदद मिलती है। यह कार्बन अवशोषण का मुख्य कारण हो सकता है। मियावाकी पद्धति द्वारा निश्चित रूप से जैव विविधता को बढाया जा सकता है। इसके साथ-2 इस प्रकार के वन के अपने अलग ही सामाजिक एवं सौन्दर्य लाभ है जिससे लोगों को आजकल के भागदौड़ की जिन्दगी में आध्यात्मिक शान्ति प्राप्त हो सकती है।
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय परिसर के मातादीन बाल्मीकी तवोवन में इस पद्धति की महत्वता को ध्यान में रखते हुए मियावाकी वन विकसित किया जा रहा है जिसमें पौधों की स्थानीय प्रजातियों को विशेष रूप से रोपित किया जा रहा है। इस पद्धति के अन्तर्गत प्रति वर्ग मीटर 3 से 5 पौधों को लगाया जा रहा है। स्थानीय प्रजातियों में मुख्य रूप से पीपल, आँवला, बेल, नीम, करंज, गुड़हल, कनेर, मोरिंगा, अमरूद, कनक चम्पा, सहजन, मोरपंखी, सागौन, अर्जुन एवं अन्य देशी पौधे एवं झाडियाँ शामिल हैं। पौधों को चार परतों में लगाया गया है जिससे एक घना एवं बहुस्तरीय जंगल तेजी से विकसित हो रहा है।
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