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Sunday, September 14, 2025

राष्ट्र निर्माण में भारतीय भाषाओं की भूमिका : डॉ. आरसी पांडेय


नित्य संदेश। भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम भर नहीं है, बल्कि वह ज्ञान, परंपरा, संस्कृति और जन-संवेदनाओं की वाहक भी है। यह समाज को जोड़ने का कार्य करती है और राष्ट्रीय एकता का आधार बनती है।

भाषा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर की जाने वाली ओछी राजनीति स्वस्थ समाज के लिए बेहद हानिकारक है। सभी भारतीय भाषाओं की राष्ट्र की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका है - यह विवाद का विषय ही नहीं होना चाहिए। असली मुद्दा है विदेशी भाषा के मुकाबले भारतीय भाषाओं की उपेक्षा करना, भारतीय भाषाओं के प्रति हीनता की भावना का वातावरण बनाना और विदेशी भाषा को समृद्धि की भाषा मान लेने की नासमझी करना।

हकीकत यह है कि कोई भी भाषा न तो छोटी होती है और न बड़ी। प्रत्येक भाषा की अपनी अस्मिता और वजूद होता है। एक ओर देश में गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति पर बल दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग क्षेत्रीय राजनीति के आधार पर भारतीय भाषाओं का विरोध करते तो दिखते हैं पर विदेशी भाषा के विरोध में मौन साध लेते हैं। यह अंधविरोध किसी भी रूप में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।

किसी भी भारतीय भाषा को अन्य भारतीय भाषाओं से कोई ख़तरा नहीं है। यह सामान्य-सी बात लोगों को समझ में नहीं आती या फिर समझते हुए भी कुछ लोग भोली-भाली जनता को गुमराह करने का प्रयास करते हैं। यह सर्वमान्य तथ्य है कि जो अपनी मातृभाषा से प्रेम करते हैं और उसका विकास चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले गुलामी की भाषा अंग्रेज़ी का विरोध करना चाहिए, क्योंकि भारत में अधिकांश कामकाज अंग्रेज़ी में करने की परंपरा बन गई है।

नई शिक्षा नीति 2020 सभी भारतीय भाषाओं के संवर्धन और संरक्षण की वकालत करती है। इसके आधार पर भाषाओं के संरक्षण के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। मातृभाषा में शिक्षा देने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई कुछ राज्यों में भारतीय भाषा हिंदी में शुरू हो चुकी है। यह भारतीय भाषाओं के पुनरुद्धार का समय है।

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 19वीं सदी के उत्तरार्ध में कहा था कि “निज भाषा ही सभी उन्नतियों का मूल है।” लेकिन आज़ाद भारत की उन्नति का आधार विदेशी भाषा को माना गया। विडंबना यह है कि तमाम किंतु-परंतु के बावजूद आज भी सरकारी कार्यालयों में अंग्रेज़ी भाषा के प्रति झुकाव देखा जाता है। इस मानसिकता में बदलाव केवल जन-जागरूकता से ही लाया जा सकता है।

केंद्र सरकार हिंदी भाषा के साथ अन्य भारतीय भाषाओं के विकास पर भी जोर दे रही है। हिंदी में सभी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोने की सामर्थ्य है। इस सामर्थ्य का उपयोग करते हुए भारत जैसे विशाल देश की अपनी एक राष्ट्रभाषा अवश्य होनी चाहिए। राष्ट्र का विकास स्वदेशी भाषा में ही संभव है। आज जब भारत विकसित राष्ट्र का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहा है, तब हिंदी भाषा का दायित्व और भी बढ़ जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी अन्य भारतीय भाषाओं के साथ कदमताल मिलाकर राष्ट्र के संकल्प को सशक्त बनाए।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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