मयंक अग्रवाल
नित्य संदेश, मेरठ। गढ़ रोड स्थित राधा गोविंद मंडप में श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस पर हरिद्वार से आए महामंडलेश्वर स्वामी अभयानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि वैदिक धर्म, सनातन धर्म आनंद प्रधान है, उत्सव प्रधान है। ज्ञान की तीन स्थिति होती है सत्संग से समझ आता है कि भगवान कौन है? ईश्वर और जीव का संबंध क्या है? ज्ञान क्या है?
रामचरितमानस कहती है "प्रथम संगति संतन कर संगा" और भागवत जी कहती है कि "श्रवण कीर्तन विष्णु स्मरण याद सेवन" इनसे समझना है शास्त्र को, जीवन को और जीवन वृत्तियों को। सत्संग से हमें ज्ञान मिलता है। मात्र किसी को जान लेने से प्रेम नहीं होता है, उससे लेना-देना नहीं होता है। जैसे बगल में कोई पड़ोसी आ जाए, हम उससे पूरी जानकारी प्राप्त करते हैं और सांसारिक लगता है तो पूछते हैं कोई जरूरत हो तो बताना, पर उसके सुख-दुख से उतना प्रभावित नहीं होते। अपरिचित से औपचारिकता निभाते हैं, प्रेम है तो संबंध बनाने की इच्छा होती है। उसके सुख से सुख और दुख से दुखी होते हैं, क्योंकि वह अपना है। प्रेम की अनुभूति संबंध से होती है जानकारी मात्र से नहीं।
सत्संग से भगवान को समझते हैं भगवान से थोड़ा प्रेम हुआ तो एक दिन अपनापन कर लो, भगवान मेरे अपने हैं "गोविंद मेरो हैं, गोपाल मेरो हैं" अर्जुन के लिए भगवान अपनी प्रतिज्ञा तक तोड़ने को तैयार हो जाते हैं। ब्रज की घटना का मूल सिद्धांत है भगवान मेरे अपने हैं। कान्हा ही मेरा अपना है, जो ये संबंध की भावना होती है बहुत दृढ़ होती है। कथा का प्रारंभ महाराज जी के तिलक और स्वागत पूजन से किया गया। अंत में आरती और सभी को प्रसाद वितरण किया गया।
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