हिंदी दिवस पर सीसीएसयू के उर्दू विभाग में साप्ताहिक ऑनलाइन कार्यक्रम "अदबनुमा" के तहत " सैनिकों की पत्नियों का संघर्ष और वंदना यादव" का आयोजन किया गया
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। हिंदी दिवस पर आयोजित संगोष्ठी में लेखिका वंदना यादव के साहित्य पर वक्ताओं ने बेहतरीन प्रस्तुति दी। सीमा पर रक्षा कर रहे सैनिकों की पत्नियों के साहस, संघर्ष और संवेदनशील परिस्थितियों से अवगत कराया जिससे मन अभिभूत हो गया। मातृभूमि के साथ-साथ मातृभाषा की रक्षा करना भी जरूरी है, तभी देश और भाषा के विकास में प्रगति होगी। ये शब्द जर्मनी के प्रसिद्ध लेखक आरिफ नकवी के थे, जो विश्वविद्यालय और अंतर्राष्ट्रीय युवा उर्दू स्कॉलर्स एसोसिएशन (अयुसा) द्वारा आयोजित ऑनलाइन कार्यक्रम में अपना अध्यक्षीय भाषण दे रहे थे।
कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. आसिफ अली ने पवित्र कुरान की तिलावत से की। डॉ इरशाद स्यानवी ने अतिथियों का स्वागत एवं डॉ. अलका वशिष्ठ ने कार्यक्रम का संचालन किया। आज का कार्यक्रम मुख्य अतिथि दिल्ली की प्रसिद्ध लेखिका वंदना यादव के कथा साहित्य में सैनिकों की पत्नियों के संघर्ष के चित्रण पर आधारित था। वंदना यादव स्वयं भी एक सैनिक की पत्नी हैं। सैनिकों की पत्नियों का जीवन उन्होंने करीब से देखा-परखा है। उनके संघर्षों और जीवन के अनुभवों को बड़ी बेबाकी से उन्होंने अपने साहित्य में वर्णित किया है। प्रसिद्ध लेखिका कल्पना मनोरमा एवं सोनम तोमर, दिल्ली ने वंदना यादव की पुस्तक 'कितने मोर्चे' और 'सिक्किम : एक स्वर्ग है यह भी' पर अपनी समीक्षा प्रस्तुत की।
वंदना यादव ने कहा कि हमें देश की रक्षा करने वाले सैनिकों की पत्नियों का उतना ही सम्मान करना चाहिए जितना कि सैनिकों का। सैनिक सीमा पर और उनकी पत्नियां घर, परिवार, समाज के न जाने कितने मोर्चों पर एक साथ हर पल एक नई जंग लड़ती दिखाई पड़ती हैं। इसके लिए उन्हें कोई मेडल नहीं मिलता, वो नींव के पत्थरों की तरह सैनिकों के परिवार और सैनिकों को मजबूती प्रदान करती हैं। हमें उनके संघर्षों को नमन करना चाहिए।
इस अवसर पर उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. असलम जमशेदपुरी ने हिंदी दिवस की बधाई देते हुए कहा कि आज का कार्यक्रम देश और भाषा को समर्पित है। हमारी भाषा दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करें और देश विकास की दिशा में आगे बढ़े। कार्यक्रम का परिचय देते हुए डॉ. इरशाद स्यानवी ने कहा कि यह एक ऐसा साहित्यिक मंच है जिसके माध्यम से हमारे कथा लेखकों और कवियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा और सुना जाता है।
प्रो रेशमा परवीन ने कहा कि आज का विषय बहुत गंभीर और संवेदनशील रहा. हिंदी दिवस के अवसर आयोजित इस कार्यक्रम में मातृभूमि की रक्षा करने वाले सैनिकों की पत्नियों की संघर्ष गाथा प्रस्तुत करने का प्रयास सफल रहा।मैं अपनी टीम के सदस्यों को बधाई देती हूं। सभी लेखिकाओं ने ऐसे शब्द प्रस्तुत किये जो दिल को छू गये।
कार्यक्रम से डॉ. आसिफ अली, डॉ. शादाब अलीम, अद्विक प्रकाशन से डॉ अशोक गुप्ता, अभिनव सोनी, डॉ स्वाति चौधरी, उजमा सहर, सैयदा मरियम इलाही, मुहम्मद शमशाद, सईद अहमद सहारनपुरी एवं छात्र जुड़े रहे।
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