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Friday, September 13, 2024

हिंदी दिवस की शुभकामनाओं सहित.... हिंदी हमारी मात्रभाषा



नित्य संदेश डेस्क
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मैंने हमेशा सुना है कि हम जो करते हैं, वही हमारे बच्चे सीखते है। यह सच प्रत्यक्ष रूप से मैंने आज देखा भी... 

मेरी बेटी नित्या अपने आई.सी.एस.ई. मान्यता प्राप्त स्कूल में अंग्रेजी माध्यम में पढ़ती है और वह आमतौर पर मुझे कही भी पढ़ाई हो या सोशल मीडिया पर अंग्रेजी पढ़ते, लिखते ही दिखती है। इन दिनों उसकी अर्धवार्षिक परीक्षा होने के कारण उसका स्कूल बेग घर पर ही है, ऐसे में मैंने सोचा क्यों न उसका बेग साफ कर दूं तो बस, मैंने जैसे ही उसके बेग में हाथ डाला तो कुछ कागज मेरे हाथ लगे। उसे देखकर मन में एक आम भाव था कि प्रायः छोटे बच्चों की तरह उसने भी फटे कागजों से खिलौने या कागज पर दिमागी खेल बनाए होंगे। 

लेकिन हुआ कुछ अलग जैसे ही मैंने मुड़े हुए कागज खोले तो मेरी कल्पना के विपरीत, उसने मेरी तरह हिंदी में हस्तलिखित, स्वरचित दो अनगढ़ कविताएं लिख रखी थी। एक "भक्त बुलाते" और दूसरी "हिंदी हमारी मात्रभाषा" उसकी वही पंक्तियां मैंने आप सबके लिए ज्यों की त्यों छायाचित्र में साझा कर दी है।

एक ओर मुझे खुशी हुई कि मेरी बेटी हिंदी से प्यार करती है इसलिए वह मेरी तरह हिंदी में मन के भाव लिख पाई है। भले ही कुछ अनगढ़ सा पर हिंदी को मात्र पाठ्यक्रम का हिस्सा समझकर नहीं बल्कि मातृभाषा समझकर कविताएं भी लिख रही है। यूं तो उसने कई मात्रा की त्रुटियों के साथ हिंदी हमारी मात्रभाषा को गढ़ा है। वैसे वह मातृभाषा लिखना चाहती होगी। जो उसे सही से नहीं लिखना आने के कारण, उसने उसे मात्रभाषा कर दिया। लेकिन सच कहूं तो उसका मात्रभाषा (मात्र + भाषा) पढ़कर मुझे मातृभाषा पढ़ने से भी ज्यादा अच्छा अनुभव हुआ। 
मुझे लगा कि हिंदी को मातृभाषा बोलने के कारण ही तो भाषावाद के द्वंद्व में वह आज तक फंसी हुई है। देखा जाए तो भारत में सबसे अधिक ४६,८२७ हिंदी भाषा की पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होती है जो स्वतः ही प्रमाण है कि हिंदी को ही लोग सबसे ज्यादा बोलते, पढ़ते, लिखते व समझते है। भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के २०० से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा पढ़ाई जाती है। वहीं शोध के अनुसार विश्व में अधिकारिक रूप से १,११७ मिलियन वक्ता होने से हिंदी दूसरे क्रम पर लोगों के द्वारा सबसे अधिक बोली जाती है। इसके पश्चात भी तथा हमारी आजादी के ७८ वर्ष के बाद भी हिंदी अपने ही देश इतनी कठिनाई उठा रही है कि वह पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण से भाषा के अलगाव को झेल रही है। वह अब तक भारत के विभिन्न प्रांतों की राज्य भाषा ही बन पाई है। हिंदी अभी तक हमारी राष्ट्र भाषा नहीं है। विडम्बना है कि हिंदी में इतनी सूचना, समाचार और साहित्य लेखन होने के बाद भी वह हमारी राष्ट्र भाषा नहीं है और अब तक भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी कहलवाने के लिए दिल्ली दूर है सी लगती है।

मुझे यहां हिंदी के लिए ऐसा भी लगता है कि हमारे देश में अधिक भाषा की भिन्नता ही इतनी समृद्धशाली हिंदी के लिए दमनकारी बन चुकी है। मेरी मातृभाषा, तेरी मातृभाषा के परिणामस्वरूप भारत जैसे देश के पास आज तक अपनी एक राष्ट्रभाषा नहीं है। 

भारत ही नहीं बल्कि विभिन्न देशों की भाषाओं की प्रतियोगिता में यूं तो हिंदी अधिक बोली, पढ़ी, समझी व लिखी जाने के कारण स्वतः ही उच्च स्थान पर है लेकिन इसकी अधिकारिक घोषणा न होने के कारण हमारी हिंदी प्रथम स्थान प्राप्ति के निर्णय की प्रतीक्षा कर रही है। 

हम लोग कई कानून बनाने के लिए गंभीरता दिखाते है पर हम लगभग ३० करोड़ लोगों के हस्ताक्षर से हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का आवेदन सरकार को सौंपने के बाद भी अधिकारिक घोषणा करने के लिए एक राग नहीं गाते और प्रतिवर्ष हिंदी पखवाड़ा, हिंदी मास बनाकर हिंदी को राष्ट्रभाषा बनवाने की बात को ठंडे बस्ते में बंद करकर भूल जाते है और प्रयासों के बाद, अभी तक हमारी वृहद भाषा हिंदी को संविधान में राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिलवा पाए है। मुझे लगता है हर भारतवासी को हिंदी के लिए मतभेद भूलना चाहिए। इसे इसकी, उसकी मातृभाषा की जगह भारतीयों की मात्र + भाषा समझकर, एक राष्ट्र, एक भाषा का सम्मान दिलवाना ही चाहिए। वास्तव में, भारतीयों में हर बार की तरह हिंदी हमेंशा अनेकता में एकता का स्वर बुलंद करती रहेगी। 

लेखिका

सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल' 
इंदौर, मध्य प्रदेश 

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