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Friday, September 27, 2024

छोटे से कस्बे से निकलकर अपनी हिम्मत, मेहनत के बल पर सानिया खानम ने प्राप्त की पीएचडी की उपाधि

ताबिश फरीद 
नित्य संदेश, मेरठ। चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में यूं तो सभी मेधावी छात्र उपस्थित थे, लेकिन उनमें कुछ ऐसे विद्यार्थी भी शामिल थे जिन्होंने संसाधन के अभाव के बावजूद उच्च शिक्षा ग्रहण की। 
सामान्य स्थिति में आगे बढ़ना कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन विपरीत परिस्थितियों में किसी मकाम को हासिल करना मुश्किल होता है। पिता का लंबी बीमारी के बाद देहांत समाज की रूढ़िवादी सोच, लोगों की नज़रों में खटकना इन सभी अज़ियतों का सामना करते हुए मेरठ के छोटे से कस्बे शाहजहांपुर से अपनी हिम्मत, मेहनत के बल पर सानिया खानम ने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। सानिया ने बताया कि उनकी PhD करने की राह बहुत मुश्किल रही, लेकिन आखिरकार उन्होंने अपने पिता के ख़्वाब को पूरा किया जो शाहजहांपुर के लिए एक मिसाल बन गया। आज पूरे कस्बे को इन पर फक्र है। इनके इस पूरे रास्ते में उनके परिवार, गुरु डॉ संजय देशवाल जिन्होंने उच्च शिक्षा और विश्वविद्यालय की राह दिखाई और सबसे अहम राजनीति विज्ञान विभाग के आचार्य प्रो संजीव कुमार शर्मा का विशेष सहयोग रहा।  

डॉ सानिया खानम ने बताया कि उनके शोध का विषय - "मुस्लिम महिलाओं का राजनीतिक समाजीकरण एवं राजनीतिक सहभागिता: मेरठ जनपद का एक अध्ययन" रहा, जिसमें निदर्शन के आधार पर साक्षात्कार अनुसूची का चयन किया और मेरठ जनपद को अपने अध्ययन का क्षेत्र बनाया, क्योंकि शोध छात्रा मेरठ जनपद और यहां की भाषा से बखूबी वाकिफ थी। विषय का चयन इसलिए किया, क्योंकि आज जब समाज में महिलाओं की हालत देखते हैं तो वहां हमें सिर्फ उनकी हालत हाशिए पर ही दिखाई देती है और उसमें भी मुस्लिम महिलाओं की हालत तो और भी दयनीय है। तो फिर क्या वजह रही कि आज जब पूरी दुनिया अधिकारों की बात करती है,आधुनिक शिक्षा की बात करती है, आधुनिक तकनीक की बात करती है तो फिर इसी कौन सी कमियां रहीं जिससे यह महिलाएं आज भी मुख्य धारा से पीछे छूट गई, मुस्लिम समाज में हक़ की बात होते हुए भी यह अपने हक़ और हुकूक के लिए भी जूझ रहीं हैं और सियासत की बात तो क्या ही करें यहां तो इन महिलाओं की तादात न के बराबर ही है, चाहे वह लोकसभा,राज्यसभा या फिर नगरीय, ग्रामीण स्तर हो।

वक्त पड़ने पर तो सभी राजनीतिक दलों के सियासतदान लंबे–चौड़े भाषण तो देते हैं लेकिन जब काम करने की बात आती है तो मुंह मोड़ लेते हैं, आज भी तरक्की के इस माहौल में मुस्लिम महिलाएं कहीं गुम सी हो गई हैं, चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो, आधुनिक तकनीक या फिर कोई नौकरी, इन महिलाओं की परेशानियां वहीं की वहीं हैं।आज भी ये महिलाएं दहेज प्रथा, प्रदा प्रथा, तलाक़, पुरुषों को चार विवाह का अधिकार, आर्थिक रूप से कमज़ोर, सामाजिक बंदिश आदि समस्याओं से जूझ रहीं हैं। आज भी इन महिलाओं को किसी रहनुमा की तलाश है। इनको उम्मीद है कि कभी तो हमारी हालत में सुधार होगा।

शोध छात्रा का निष्कर्ष यह निकल कर सामने आता है, जिसमें कुछ सुधाव भी किए गए हैं कि भले ही आज का समाज कितना भी तरक्की कर चुका हो लेकिन आज भी पुरुषवादी मानसिकता सभी पर हावी है। महिलाएं जिस भी राजनीतिक दल को वोट दे कर आती हैं उस पर भी परिवार के पुरुषों की राय शामिल होती है। फिर भी इन महिलाओं का मानना है कि हम किसी भी राजनीतिक दल को चुनते हैं उसने हमें सिर्फ जाति और धर्म के आधार पर छला ही है, इसी कारण राजनीति में आज हम सब सिर्फ एक मतदाता के रूप में ही रह गए। जबकि इतिहास में बहुत सी ऐसी मुस्लिम महिलाएं आई हैं जिन्होंने राजनीति में भी अपना परचम लहराया है। यहां पर मुझे एक शेर याद आया कि हैरत है कि "इल्म और तालीम में हैं पीछे ,जिस कौम का आगाज़ ही इक़रा से हुआ है" ।

इन महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए सबसे पहले परिवार और कौम को साथ देना चाहिए और साथ ही सरकार इन महिलाओं को ध्यान में रखकर ऐसे कानून बनाए जो असल जिंदगी में भी लागू हों। कानूनों का सही तरीके से लगू न होना भी इनकी हालत का जिम्मेदार है। जो योजनाएं चलाई जाएं उनमें विशेष रूप से इन महिलाओं का ध्यान रखा जाए।

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