नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। विक्टोरिया गार्डन स्थित निज निवास 11-जी में चल रही सामवेद की दशमी कथा के षष्ठ दिवस पर शुक्रवार को कथाव्यास पारुल मित्तल ने सामवेद के नवम प्रपाठक में वर्णित इन्द्र, अग्नि और जल की कथा का विस्तार से वर्णन किया। कथा का शुभारंभ "जय जय अग्निदेव" के जयघोष के साथ हुआ।
कथाव्यास पारुल मित्तल ने बताया कि अग्नि समस्त सृष्टि में व्याप्त ऊर्जा, ऊष्मा और परिवर्तन का स्रोत है। उसका आध्यात्मिक स्वरूप ज्ञान और चेतना का प्रतीक है, जिसे शुद्धि, प्रकाश और जागरण से जोड़ा गया है। उन्होंने कहा कि जलों में अग्नि का वीर्य निहित है, जो शारीरिक वीर्य नहीं बल्कि मूल ऊर्जा है और परमपिता की शक्ति प्रकृति के विभिन्न रूपों में व्याप्त है। उन्होंने बताया कि सूर्य की उपमा स्वर्णिम पंखों वाले पक्षी से दी गई है। वरुण ब्रह्माण्ड की समस्त व्यवस्थाओं के व्यवस्थापक हैं, जबकि यम का संबंध नियम, मर्यादा और जीवन-मृत्यु के चक्र से है। वैदिक मंत्रों में गंधर्व वेग, प्रकाश और आकाशीय शक्ति के प्रतीक हैं। इन्द्र गति, शक्ति, सजगता और साहस के प्रतीक हैं और प्रत्येक व्यक्ति में ये गुण होने चाहिए। इन्द्र बलवान, जागरूक, स्थिर और साहसी हैं तथा उनका वज्र दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। यज्ञ का अर्थ स्वार्थ से ऊपर उठकर परहित में कार्य करना है। इस दौरान कथाव्यास ने कथा के बीच-बीच में मधुर भजनों की प्रस्तुति भी दी, जिससे श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए।
कथा में सामवेद के मंत्रों -इन्द्रस्य वरुणस्य राज्ञ... से लेकर गच्छामित्रान्प्रपद्यस्व... तक का सस्वर पाठ किया गया।

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