-अंधेरे से उजाले तक का सफर: जहाँ महिलाएं रास्ता बदल लेती थीं, आज वहां क्रिकेट का शोर है
लियाकत मंसूरी
नित्य संदेश, मेरठ। कभी अपने दूसरे नाम से जाना जाने वाला मेरठ का 62, कबाड़ी बाजार क्षेत्र आज एक नई कहानी लिख रहा है। जहां कभी अंधेरा और खामोशी पसरी रहती थी, आज उसी जगह पर युवाओं के बल्ले की ठक-ठक और चौके-छक्कों का शोर गूंज रहा है।
रविवार को यहां शिमजा क्रिकजोन टर्फ का भव्य शुभारंभ हुआ। यह सिर्फ एक क्रिकेट
टर्फ का उद्घाटन नहीं, बल्कि मेरठ की एक पुरानी पहचान को बदलने की एक साहसिक पहल
है। इस बदलाव के पीछे हैं युवा उद्यमी जुनैद जमील अहमद। उन्होंने इस जगह को चुना,
जहां आम तौर पर लोग निवेश करने से कतराते हैं। उनका उद्देश्य साफ है - "खेल
को हर गली तक ले जाना और इस क्षेत्र को एक नई, सकारात्मक पहचान देना।" टर्फ
का कॉन्सेप्ट है - PLAY | WATCH | CONNECT। यहां युवाओं को प्रोफेशनल क्रिकेट
प्रैक्टिस के लिए ग्रीन टर्फ, नेट प्रैक्टिस, बॉक्स क्रिकेट और नाइट क्रिकेट की
सुविधा मिलेगी।
युवाओं के लिए नई उड़ान
उद्घाटन समारोह में शहर के कई गणमान्य लोग, खेल प्रेमी और बड़ी संख्या में
युवा मौजूद रहे। सभी ने इस पहल की सराहना की। स्थानीय युवाओं का कहना है कि अब तक
उन्हें प्रैक्टिस के लिए शहर से दूर जाना पड़ता था, लेकिन शहर के बीचों-बीच
विश्वस्तरीय सुविधा मिलने से उनका समय और पैसा दोनों बचेगा और प्रतिभा को निखारने
का मौका मिलेगा। समारोह के दौरान अतिथियों ने भी बल्ला थामकर टर्फ का अनुभव लिया
और इस पहल को मेरठ के बदलते चेहरे का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि यह मेरठ के
लिए गर्व की बात है कि एक ऐसी जगह जो कभी नकारात्मक कारणों से जानी जाती थी, आज
सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र बन रही है।
क्या है खास?
यह टर्फ न केवल खेल को बढ़ावा देगी, बल्कि इस क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक
रूपांतरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। जहां कभी लोग आने से कतराते थे, वहां
अब परिवार और युवा क्रिकेट का आनंद लेने आएंगे। यह सच में रेड लाइट से स्पोर्ट्स
लाइट तक का सफर है।
वो दौर, जब लोग कतराते थे
जुनैद जमील अहमद बताते हैं कि एक समय था, जब यहां दिन में भी लोग व्यापार करने
से कतराते थे। शाम ढलते ही इस गली की रौनक बाजार जैसी नहीं, बल्कि एक अजीब से
सन्नाटे और डर में बदल जाती थी। स्थिति ऐसी थी कि महिलाएं और स्कूली लड़कियां कबाड़ी
बाजार की सड़क से गुजरने से भी बचती थीं। उन्हें लंबा रास्ता लेकर जाना मंजूर था,
लेकिन इस रास्ते से नहीं। दुकानदार शाम होते ही शटर गिराने लगते थे। अंधेरा होते
ही असामाजिक तत्वों का जमावड़ा शुरू हो जाता था और पूरे क्षेत्र में एक असुरक्षा
का माहौल बन जाता था। इस इलाके को शहर के लोग रेड लाइट एरिया के नाम से जानते थे
और इसी वजह से एक पूरा बाजार बदनाम था।
यह सिर्फ टर्फ नहीं, एक संदेश है
इस पहल के पीछे हैं युवा उद्यमी जुनैद जमील अहमद। उन्होंने हिम्मत दिखाई उस
जगह निवेश करने की, जहां लोग पैर रखने से भी कतराते थे। उनका कहना है - "हम
इस जगह को बदनाम गली से खेल की गली बनाना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि लोग कहें -
चलो कबाड़ी बाजार, क्रिकेट खेलने।" यह मेरठ के लिए एक मिसाल है। यह बताता है
कि कोई भी जगह बुरी नहीं होती, सोच बुरी होती है। जब सोच बदलती है तो रेड लाइट
एरिया भी स्पोर्ट्स जोन बन जाता है।

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