नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। ग्लोबल कैंपस — अंतर्राष्ट्रीय इंटर्नशिप विश्वविद्यालय (IIU) द्वारा हाल ही में "कॉन्जुगल कॉनकॉर्ड एंड द आर्किटेक्चर ऑफ लॉ: ए फिलॉसॉफिकल-डॉक्ट्रिनल इंक्वायरी इन टू द सिविल लॉ ऑफ मैरिज इन नाइजीरिया" (नाइजीरिया में विवाह के नागरिक कानून का एक दार्शनिक एवं सैद्धांतिक अध्ययन) विषय पर एक वैश्विक वेबिनार आयोजित किया गया। इस वेबिनार के मुख्य वक्ता चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के विधि अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. विवेक कुमार त्यागी थे। उन्होंने अपने व्याख्यान में नाइजीरिया की वैधानिक (स्टैच्युटरी), प्रथागत (कस्टमरी) और इस्लामिक कानूनी प्रणालियों के परस्पर जटिल संबंधों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। अंतर्राष्ट्रीय कानूनविदों, न्यायविदों, शोधार्थियों और नीति विशेषज्ञों को संबोधित करते हुए डॉ. त्यागी ने बताया कि नाइजीरिया की कानूनी व्यवस्था अपनी विरासत में मिली 'कॉमन-लॉ' परंपराओं, स्थानीय सामुदायिक प्रथाओं और लैंगिक समानता के आधुनिक संवैधानिक अधिकारों के बीच किस प्रकार संतुलन बनाए रखती है।
वैवाहिक कानून के दार्शनिक आधारों से व्याख्यान की शुरुआत करते हुए डॉ. त्यागी ने पांच प्रमुख न्यायशास्त्रीय सिद्धांतों को रेखांकित किया। सर हेनरी मेन के 1861 के 'स्टेटस एंड कॉन्ट्रैक्ट' (स्थिति और अनुबंध) के सिद्धांत का विश्लेषण करते हुए उन्होंने प्रथागत विवाह—जो मुख्य रूप से वंश और सामाजिक स्वीकृति पर आधारित दो परिवारों का जुड़ाव है—की तुलना वैधानिक विवाह से की, जो व्यक्तिगत सहमति, सरकारी नोटिस और औपचारिक पंजीकरण पर टिका होता है। प्राकृतिक कानून (Natural Law) का संदर्भ देते हुए उन्होंने बताया कि नाइजीरियाई न्यायशास्त्र ने ब्रिटेन के पुराने 'कवर्चर' सिद्धांत (जिसमें पति-पत्नी को एक ही कानूनी इकाई माना जाता था) को खारिज कर समतावादी वैवाहिक मॉडल को अपनाया है। फ्रेडरिक कार्ल वोन सेविगैनी के 'हिस्टोरिकल स्कूल' का हवाला देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि नाइजीरियाई अदालतें प्रथागत विवाहों को किसी समुदाय की विशिष्ट चेतना या वॉल्क्सगाइस्ट (Volksgeist) की प्रामाणिक अभिव्यक्ति मानकर उन्हें मान्यता देती हैं। कानूनी बहुलवाद (Legal Pluralism) पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि नाइजीरिया में वैधानिक, प्रथागत और इस्लामिक व्यवस्थाएं एक-दूसरे को लगातार प्रभावित करती हैं। इसके अलावा, रोनाल्ड ड्वोर्किन के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए उन्होंने जोर दिया कि नाइजीरियाई संविधान की धारा 42 में दिए गए मौलिक अधिकार किसी भी भेदभावपूर्ण प्रथागत नियम से ऊपर हैं। डॉ. त्यागी ने कहा, "नाइजीरिया में इन तीनों कानूनी प्रणालियों का सह-अस्तित्व महज एक ऐतिहासिक इत्तेफाक नहीं, बल्कि अलग-अलग कानूनी अवधारणाओं का एक अनूठा संगम है"। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करते हुए भी मौलिक अधिकारों की सर्वोच्चता हर हाल में कायम रहनी चाहिए।
नाइजीरिया के त्रिस्तरीय कानूनी ढांचे के व्यावहारिक पक्षों पर प्रकाश डालते हुए डॉ. त्यागी ने प्रत्येक वैवाहिक प्रणाली की कानूनी स्थिति स्पष्ट की। 'मैरिज एक्ट' और 'मैट्रीमोनियल काजेज एक्ट' के तहत दर्ज वैधानिक विवाह पूरी तरह से एकपत्नी/एकपति (मोनोगेमस) और स्थायी होता है, जैसा कि हाइड बनाम हाइड के ऐतिहासिक मामले में तय किया गया था। इसे समाप्त करने के लिए अदालत में कानून के तहत यह सिद्ध करना अनिवार्य होता है कि "विवाह अब अपरिवर्तनीय रूप से टूट चुका है"। इसके विपरीत, प्रथागत और इस्लामिक विवाह बहुविवाह की अनुमति देते हैं और ये 'मैट्रीमोनियल काजेज एक्ट' के दायरे से बाहर हैं। प्रथागत विवाह की कानूनी वैधता आपसी सहमति, 'ब्राइड प्राइस' (वधू मूल्य) के भुगतान और लड़की को औपचारिक रूप से ससुराल वालों को सौंपने पर निर्भर करती है। यदि कोई जोड़ा पहले प्रथागत विवाह करता है और बाद में आपस में ही वैधानिक विवाह कर लेता है (जिसे 'डबल-डेकर' मैरिज कहा जाता है), वैधानिक विवाह उस रिश्ते को पूरी तरह से एकपत्नी/एकपति वाले विवाह में बदल देता है। हालांकि, किसी एक प्रथागत विवाह के रहते हुए किसी तीसरे व्यक्ति से वैधानिक विवाह करना कानूनी रूप से अमान्य (Void) होता है और यह 'द्विविवाहन' (Bigamy) का अपराध भी बन सकता है।
व्याख्यान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नाइजीरिया के सुप्रीम कोर्ट द्वारा संपत्ति उत्तराधिकार में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त करने वाले ऐतिहासिक फैसलों पर केंद्रित था। न्यायिक फैसलों के क्रम को समझाते हुए डॉ. त्यागी ने बताया कि हालांकि कोर्ट ऑफ अपील ने मोजेक्वू बनाम मोजेक्वू मामले में बेटियों को बेदखल करने वाली ननेवी की 'ओली-एकपे' प्रथा को अमानवीय घोषित किया था, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने मोजेक्वू बनाम इवुचुकवू मामले में प्रथागत कानूनों पर एकतरफा टिप्पणी करने से बचने की सलाह दी थी। इसके बाद, वर्ष 2014 के ऐतिहासिक मामलों (उकेजे बनाम उकेजे और अनेक्वे बनाम न्वेके) में सुप्रीम कोर्ट ने यह ऐतिहासिक व्यवस्था दी कि बेटियों और निःसंतान विधवाओं को संपत्ति के अधिकार से वंचित करने वाली प्रथाएं संविधान की धारा 42 का सीधा उल्लंघन करती हैं और पूरी तरह से अमान्य हैं।
व्याख्यान के अंत में डॉ. त्यागी ने नाइजीरियाई पारिवारिक कानून के समक्ष मौजूद समकालीन चुनौतियों का उल्लेख किया। उन्होंने 'चाइल्ड राइट्स एक्ट 2003' के तहत विवाह की न्यूनतम 18 वर्ष की आयु और संविधान की धारा 29(4)(b) के बीच के विरोधाभास को रेखांकित किया। इसके साथ ही उन्होंने बच्चों की कस्टडी और संपत्ति विवादों में अलग-अलग अदालतों के चुनाव (Forum Shopping) की समस्या पर ध्यान आकर्षित किया और प्रथागत व इस्लामिक कानूनों को आधुनिक संवैधानिक समानता के अनुरूप ढालने के लिए जरूरी कानूनी सुधारों पर बल दिया।
इस व्याख्यान के अन्त में प्रो0 चार्ल्स यूसीहोलो इभोरिया, वाइस चान्सलर, इन्टरनेशनल इंटरसिप यूनिवर्सिटी से डा0 विवेक त्यागी का धन्यवाद ज्ञापित किया और व्याख्यान को एक सम्पूर्ण विषय समेकित करने वाला बताया। साथ ही इस अवसर पर प्रो0 बूहारी इसास, प्रो0 चूकोबूयूनोओसो चार्ल्स आफोइोम उपस्थित रहे।

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