आईआईटी बॉम्बे की घटना से उठते गंभीर प्रश्न
प्रो. (डॉ.) अनिल नौसरान
नित्य संदेश। आईआईटी बॉम्बे में हाल ही में हुई एक छात्र की दुखद मृत्यु ने देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में शैक्षणिक अनुशासन, मानसिक स्वास्थ्य, जातिगत भेदभाव के आरोप, शिक्षक की जवाबदेही तथा छात्र–शिक्षक संबंधों पर गंभीर चर्चा को जन्म दिया है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार परीक्षा के दौरान छात्र द्वारा मोबाइल फोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के कथित उपयोग का मामला सामने आया था। इसके बाद छात्र की मृत्यु हो गई। परिवार ने जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं, जबकि संस्थान की ओर से इन आरोपों के संबंध में अलग पक्ष सामने आया है। मामले की जांच अभी जारी है।
ऐसी संवेदनशील घटना में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले निष्पक्ष जांच आवश्यक है। किसी छात्र की आत्महत्या को केवल परीक्षा में हुई किसी घटना, शिक्षक की कार्रवाई, जातिगत पहचान अथवा किसी एक कारण से जोड़ देना वैज्ञानिक और न्यायिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
आरक्षण और शैक्षणिक गुणवत्ता पर संतुलित बहस आवश्यक
भारत में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) सहित विभिन्न वर्गों के लिए शैक्षणिक अवसरों में आरक्षण संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था का हिस्सा है। केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान कानून द्वारा निर्धारित है तथा आईआईटी में भी सरकारी नियमों के अनुसार प्रवेश दिए जाते हैं। SC/ST विद्यार्थियों के लिए कुछ संस्थानों में प्रारंभिक तैयारी पाठ्यक्रम तथा अन्य शैक्षणिक सहायता की व्यवस्था भी है।
इस विषय पर बहस करते समय किसी भी आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों को सामूहिक रूप से कम मेधावी अथवा कम मानसिक क्षमता वाला बताना उचित नहीं है। किसी विद्यार्थी की क्षमता उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके व्यक्तिगत शैक्षणिक प्रदर्शन, मेहनत, सीखने की क्षमता और उपलब्धियों से निर्धारित होनी चाहिए।
साथ ही यह प्रश्न अवश्य उठाया जा सकता है कि अत्यंत कठिन और प्रतिस्पर्धी पाठ्यक्रमों में प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों को पर्याप्त शैक्षणिक सहयोग, मार्गदर्शन और मानसिक स्वास्थ्य सहायता मिल रही है या नहीं। यदि किसी विद्यार्थी को प्रारंभिक शैक्षणिक अंतर के कारण कठिनाई हो रही है, तो उसका समाधान अतिरिक्त शिक्षण, मार्गदर्शन, ट्यूटोरियल और परामर्श के माध्यम से किया जाना चाहिए।
शिक्षक की भूमिका और अधिकारों की भी रक्षा हो
शिक्षक का दायित्व केवल पढ़ाना नहीं है। परीक्षा में नकल रोकना, शैक्षणिक ईमानदारी बनाए रखना और सभी विद्यार्थियों के लिए समान नियम लागू करना भी शिक्षक की जिम्मेदारी है।
यदि कोई शिक्षक परीक्षा में अनुचित साधन का उपयोग करते हुए किसी विद्यार्थी को पकड़ता है, तो केवल इस कारण कि बाद में विद्यार्थी ने कोई गंभीर कदम उठाया, शिक्षक को स्वतः दोषी नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी आपराधिक अथवा कानूनी जिम्मेदारी का निर्धारण निष्पक्ष जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए।
दूसरी ओर, यदि जांच में किसी शिक्षक अथवा प्रशासनिक अधिकारी द्वारा वास्तविक भेदभाव, अपमान, उत्पीड़न या कानून का उल्लंघन सिद्ध होता है, तो उसके विरुद्ध भी नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। नियम विद्यार्थी के लिए भी हों और शिक्षक के लिए भी—लेकिन नियम सबके लिए समान हों।
SC/ST विद्यार्थियों के लिए बेहतर शैक्षणिक सहयोग
अलग संस्थान बनाने के बजाय एक अधिक व्यावहारिक व्यवस्था यह हो सकती है कि प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान में कमजोर शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले विद्यार्थियों के लिए:
- प्रारंभिक तैयारी पाठ्यक्रम
- आधारभूत अध्ययन कक्षाएँ
- शिक्षक मार्गदर्शन
- सहपाठी मार्गदर्शन
- नियमित शैक्षणिक परामर्श
- मनोवैज्ञानिक परामर्श
- अतिरिक्त ट्यूटोरियल कक्षाएँ
- भाषा एवं संचार संबंधी सहायता की मजबूत व्यवस्था हो।
SC/ST विद्यार्थियों के लिए निर्धारित सहायता व्यवस्था में संबंधित वर्ग के अनुभवी शिक्षकों और परामर्शदाताओं की भागीदारी भी बढ़ाई जा सकती है। लेकिन ऐसी व्यवस्था विद्यार्थियों को मुख्य शैक्षणिक समुदाय से अलग करने के बजाय उन्हें मुख्यधारा में सफलतापूर्वक आगे बढ़ाने वाली होनी चाहिए।
मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए
आज के उच्च शिक्षण संस्थानों में केवल परीक्षा और अंक ही पर्याप्त नहीं हैं। विद्यार्थियों पर शैक्षणिक दबाव, प्रतिस्पर्धा, करियर की अनिश्चितता, आर्थिक कठिनाइयाँ, पारिवारिक अपेक्षाएँ और सामाजिक समायोजन जैसे अनेक दबाव हो सकते हैं।
इसलिए प्रत्येक बड़े शिक्षण संस्थान में नियमित रूप से:
चिकित्सकों के प्रेरणात्मक व्याख्यान • व्यावसायिक परामर्श • ध्यान कक्ष • इनडोर एवं आउटडोर खेल • स्वास्थ्य एवं कल्याण कार्यक्रम की व्यवस्था होनी चाहिए। हर विद्यार्थी को यह समझना चाहिए कि असफलता जीवन का अंत नहीं है।
पुस्तकालय भी अध्ययन के अनुकूल वातावरण का केंद्र बने
संस्था की पुस्तकालय केवल पुस्तकों का कमरा नहीं होनी चाहिए। वहाँ:
- पर्याप्त प्रकाश
- स्वच्छता
- शांत वातावरण
- आरामदायक बैठने की व्यवस्था
- उचित वायु-संचार
- पीने के पानी की व्यवस्था
- आवश्यक डिजिटल सुविधाएँ उपलब्ध होनी चाहिए।
लंबे समय तक अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के लिए परिसर में स्वच्छ और पौष्टिक भोजन की छोटी कैंटीन भी उपयोगी हो सकती है।
शैक्षणिक ईमानदारी से कोई समझौता नहीं
नकल, साहित्यिक चोरी, परीक्षा में अनुचित साधनों का प्रयोग अथवा किसी अन्य प्रकार की शैक्षणिक अनियमितता किसी भी शिक्षण संस्थान की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को प्रभावित करती है।
लेकिन शैक्षणिक अनुशासन लागू करते समय उचित प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। नियम पहले से स्पष्ट हों, जांच पारदर्शी हो, विद्यार्थी को अपना पक्ष रखने का अवसर मिले और दंड संस्थान के निर्धारित नियमों के अनुरूप हो।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग के दौर में यह और भी आवश्यक हो गया है कि संस्थान स्पष्ट रूप से निर्धारित करें कि AI का उपयोग कब अध्ययन का साधन है और कब वह शैक्षणिक अनियमितता माना जाएगा।
शिक्षक भी इंसान हैं
शिक्षक से अनुशासन, संवेदनशीलता और निष्पक्षता की अपेक्षा स्वाभाविक है, लेकिन शिक्षक को भी झूठे आरोप, अनुचित दबाव और बिना जांच के सार्वजनिक दोषारोपण से सुरक्षा मिलनी चाहिए।
इसी प्रकार यदि कोई शिक्षक वास्तव में विद्यार्थियों के साथ भेदभाव अथवा उत्पीड़न करता हुआ पाया जाता है, तो उसके विरुद्ध भी संस्थागत नियमों के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थी की गरिमा और शिक्षक की गरिमा—दोनों की रक्षा आवश्यक है।
निष्कर्ष
आईआईटी बॉम्बे जैसी घटनाओं को किसी एक जाति, वर्ग, शिक्षक या विद्यार्थी के विरुद्ध सामान्यीकृत करने के बजाय इन्हें शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।
हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जिसमें:
मेधा हो • समान अवसर हो • सामाजिक न्याय हो • शैक्षणिक ईमानदारी हो • मानसिक स्वास्थ्य सहायता हो • शिक्षक संरक्षण हो • विद्यार्थी संरक्षण हो
आरक्षण की वर्तमान कानूनी व्यवस्था में किसी भी परिवर्तन पर निर्णय संवैधानिक प्रक्रिया, उपलब्ध आंकड़ों और व्यापक सार्वजनिक विमर्श के आधार पर होना चाहिए। इसी प्रकार उच्च शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता केवल प्रवेश प्रक्रिया से नहीं, बल्कि शिक्षण की गुणवत्ता, शैक्षणिक सहयोग, अनुशासन, मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षित परिसर के वातावरण से भी निर्धारित होती है। शिक्षक और विद्यार्थी आमने-सामने नहीं—एक ही शिक्षा व्यवस्था के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।
शिक्षक सुरक्षित होगा तो शिक्षा सुरक्षित होगी।
विद्यार्थी सुरक्षित होगा तो भविष्य सुरक्षित होगा।
प्रो. (डॉ.) अनिल नौसरान
MBBS | MD
संस्थापक साइक्लोमैड फिट इंडिया
जनस्वास्थ्य अधिवक्ता
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