गुरु गोरखनाथ भगवान श्री कृष्ण और माता रुक्मिणी का विवाह में हुए थे शामिल
अशोक कुमार
नित्य संदेश, मेरठ। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर कैंट सदर मौहल्ला धर्म पुरी स्थित गुरु गोरक्षनाथ सिद्ध पीठ
अखाड़े के सेवकों ने भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया।
इस अवसर पर गुरु परिवार ने श्री कृष्ण की प्रतिमा दुध व गंगा जल स्नान कराकर नव परिधान एवं फुल माला से सिंगार कर मक्खन मिश्री का भोग लगाकर कर दीप प्रज्ज्वलित कर मंगल आरती की और पंच मेवा व चरणामृत का प्रसाद वितरण किया। गुरु गोरक्षनाथ के सेवकों ने संकीर्तन कर श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवाय के भजन संध्या का आयोजन किया। इस अवसर पर सेवक गौरव नाथ सेवक सेवक अशोक सेवक अभिषेक गीता अमिता सहित अन्य श्रदा्धालु मौजूद रहे।
सदर स्थित गुरू गोरखनाथ के सेवकों द्वारा लगभग पच्चीस वर्षों से गुरु जी का धुना लगा कर अलख जगाई जा रही है। इस अवसर पर गुरु सेवकों ने बताया नाथ परंपरा और हिंदू मान्यताओं के अनुसार, महायोगी गुरु गोरखनाथ जी को कालजयी (समय की सीमाओं से परे) माना जाता है, जिन्होंने हर युग (सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग) में अवतार लिया या अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
पौराणिक मान्यताओं और लोक-कथाओं के अनुसार, महायोगी गुरु गोरखनाथ और भगवान श्रीकृष्ण के संबंध को विभिन्न युगों की लीलाओं से जोड़ा जाता है। द्वापर युग और गुरु गोरखनाथ हिंदू ग्रंथों में एक प्रसंग यह भी मिलता है कि गुरु गोरखनाथ ने द्वापर युग में भी अपनी उपस्थिति दर्ज की थी। ऐसा कहा जाता है कि जब गुजरात के गिरनार (जूनागढ़) क्षेत्र में स्थित गोरखमढ़ी में गुरु गोरखनाथ तपस्यारत थे,
जब भगवान श्री कृष्ण और माता रुक्मिणी का विवाह संपन्न हो रहा था, तब देवताओं और ऋषियों के आग्रह पर महायोगी गोरखनाथ जी भी उस अलौकिक विवाह में शामिल हुए थे। आज भी गोरखपुर के प्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर में जन्माष्टमी का त्योहार बहुत भव्य रूप से मनाया जाता है, क्योंकि नाथ संप्रदाय में माना जाता है कि गुरु गोरखनाथ जी स्वयं उस विवाह और कृष्ण लीलाओं के साक्षी बने थे।
कंकण-बंधन: कथाओं में कहा जाता है कि गुरु गोरखनाथ ने ही श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का कंकण-बंधन सिद्ध किया था*।
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