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Saturday, September 5, 2026

डॉ० अंजना चक्रपाणि मिश्र की दो नवीन कृतियों — 'मन अनहद नाद' और 'अनकहे से संवाद' के भव्य विमोचन

सपना सी.पी. साहू 

नित्य संदेश, इंदौर। वामा साहित्य मंच 'शब्द शक्ति की संवाहक' प्रतिष्ठित संस्था के तत्वावधान में एक गरिमामयी साहित्यिक समारोह का आयोजन संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ० अंजना चक्रपाणि मिश्र की दो नवीन कृतियों — काव्य संग्रह 'मन अनहद नाद' और आलेख संग्रह 'अनकहे से संवाद' का गरिमापूर्ण विमोचन हुआ।


कार्यक्रम का शुभारंभ लेखिका की नातिन अलाइना द्वारा प्रस्तुत गणेश वंदना और लब्धप्रतिष्ठ गायिका आकांक्षा जाचक शेट्टी द्वारा मधुर स्वर में गाई गई मां सरस्वती वंदना से हुआ, जिसने संपूर्ण वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। तत्पश्चात, वामा साहित्य मंच की अध्यक्षा ज्योति जैन ने शब्द-पुष्पों से अतिथियों, साहित्यकारों एवं सभी उपस्थित जनों का आत्मीय स्वागत किया। उन्होंने कहा कि लेखिका तत्सम प्रधान भाषा का सौंदर्य बनाए रखते हुए समाज की विसंगतियों को प्रखरता से उजागर करती हैं। उन्होंने समाज में बिखरे भाव-शब्दों को एक सुंदर माला में पिरोया है; उनकी दोनों पुस्तकें अत्यंत उम्दा और पठनीय हैं।


पारिवारिक पाती का वाचन करते हुए कनिष्क मिश्र ने कहा कि माँ भले ही संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग करती हैं, परंतु जिस आत्मीयता से वे सभी को सुनती हैं, वे शब्द बेहद सुंदर बन जाते हैं — यही उनके मन का 'अनहद नाद' है। वहीं निष्ठा मिश्र ने इस दिन को विशेष बताते हुए कहा कि माँ की रचनाएं थोड़ी क्लिष्ट जरूर हैं, परंतु वे उनके प्रयास, लगन और अटूट जुनून का उत्सव हैं। ये कृतियां उनके समृद्ध अनुभवों और प्रेरणा का सजीव उदाहरण हैं। माँ की यह उपलब्धि उनकी लेखनी की सुखद शुरुआत है; अभी उन्हें बहुत कुछ लिखना है और हमें अपनी भावनाएं व्यक्त करनी हैं।


लेखिका ने मंचासीन अतिथियों एवं उपस्थित जनसमूह का सहृदय अभिवादन करते हुए और सभी को अपना वृहद परिवार बताते हुए अपनी पुस्तकों के विषय में कहा, "मेरी पुस्तकें मेरा दर्पण हैं, जो आपको मुझसे साक्षात्कार करवाएंगी। मैं लोगों के सुख-दुख को गहराई से महसूस करती हूँ और स्वयं को उनके स्थान पर रखकर लिखती हूँ। मेरे पिता जी आयुर्वेदाचार्य थे; उनकी प्रेरणा और साधारण परिवेश में पली मेरी माँ प्रसूति रोग विशेषज्ञ बनीं, जिनसे मुझे सदैव संबल मिला है। मेरा पूरा परिवार — पति, पुत्री और पुत्र — सदैव मेरे मार्गदर्शक व सहयोगी रहे हैं।" इसके उपरांत उन्होंने "रजत राग — चंदनियाँ गुनगुना रही है..." गीत की सुमधुर प्रस्तुति देकर संपूर्ण सभा को मंत्रमुग्ध कर दिया।


दोनों कृतियों पर गहन एवं सारगर्भित समीक्षा प्रोफेसर व वरिष्ठ साहित्यकार डॉ० गरिमा संजय दुबे ने प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि पठन व लेखन एकांत में घटने वाली ऐसी क्रियाएं हैं जो पाठक को पूरी तरह अपने प्रभाव में ले लेती हैं। लेखिका ने गद्य और पद्य दोनों विधाओं के साथ पूर्ण न्याय किया है, जो कि एक कठिन कार्य है। ये पुस्तकें परस्पर संवादों का प्रतिबिंब और एक-दूसरे की पूरक हैं। जिस प्रकार एक कुशल रसोइया मूल तत्वों का संयोजन कर स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करता है, उसी प्रकार शब्द रूपी मूल तत्व से ये दो उत्कृष्ट पुस्तकें रची गई हैं। 'मन अनहद नाद' की कविताएं स्वयं के मन को खोजते हुए दूसरों के अंतर्मन की यात्रा कराती हैं। लेखिका का स्त्री-भाव, राधा-कृष्ण का निश्छल प्रेम और आध्यात्मिक शैली अनूठी और सुंदर है। इसमें गजानन की स्तुति, 'प्रतीक्षा नहीं करती...', प्रेम का आत्मनिर्भर स्वरूप, 'स्वप्न जो पहले न देखा था' तथा 'बिटिया की पहली साड़ी' जैसी रचनाओं के साथ-साथ नज्म व गज़लें भी बेहद आकर्षक हैं। उन्होंने रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) जैसे उपेक्षित विषय पर भी संवेदनशीलता से लिखा है कि यह समय थकान का नहीं, बल्कि सामाजिक बंधनों से मुक्त होने का है।


वहीं आलेख संग्रह लालित्यपूर्ण एवं प्रवाहपूर्ण शैली में रचा गया है। इसमें संस्कृत भाषा, लोक-परंपरा और बनारस की आध्यात्मिकता के साथ आधुनिकता का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। 'नीला लिफाफा' और स्त्रियों पर परिस्थितियों के प्रभाव का अध्ययन करते हुए उन्होंने लिखा कि आज की स्त्रियां दृश्य में अधिक और दृष्टि में कम हैं। 'कबीर चौरा' व 'मणिकर्णिका घाट' जैसे आलेख अत्यंत प्रभावकारी बन पड़े हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि क्लिष्टता केवल अज्ञात विषयों में होती है, अतः उन्होंने सभी को अधिक से अधिक स्वाध्याय की सलाह दी।


वामा साहित्य मंच की संस्थापक अध्यक्ष पद्मा राजेंद्र ने इस अवसर को स्नेह, प्रसन्नता एवं गर्व की अनुभूति बताया। उन्होंने कहा कि लेखिका उनकी आत्मीय सखी हैं और रिश्तों के सुख-दुख की सच्ची सारथी हैं। उनका संवेदनशील और कोमल हृदय उनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकती प्रतिभा का प्रमाण है।


विशिष्ट अतिथि के रूप में पधारीं सामान्य प्रशासन विभाग की पूर्व सचिव एवं पूर्व आईएएस श्रीमती शैलबाला मार्टिन पाठक ने कहा कि लेखिका एक अत्यंत भरोसेमंद सखी हैं, जिनसे मन की बात साझा करना सहज हो जाता है। उनके व्यक्तित्व में आधुनिकता और परंपरा का अनुपम संगम है। उनकी कविताएं अंतर्मन की अभिव्यक्ति हैं जो भावनाओं को कलात्मक रूप देकर सोचने पर विवश करती हैं। इसके बाद उन्होंने लेखिका की 'संवेदना' और 'बनारस की गलियां' कविताओं का पाठ किया।


आकांक्षा जाचक शेट्टी ने लेखिका को विलक्षण प्रतिभा की धनी बताते हुए कहा कि वे दूसरों के मनोभावों को सहज ही समझ लेती हैं। उन्होंने डॉ० अंजना चक्रपाणि कृत 'चेती गीत' सुनाकर समां बांध दिया।


समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में प्रख्यात साहित्यकार एवं शिवना प्रकाशन के निदेशक पंकज सुबीर उपस्थित रहे। उन्होंने कृतियों की तुलना बेटियों से करते हुए कहा कि संग्रह की कविताओं और आलेखों ने पाठक को आश्चर्यचकित किया है। रजोनिवृत्ति जैसे विषय को चुनना साहसिक है, जिसे प्रायः साहित्य में छोड़ दिया जाता है। उनकी रचना 'स्त्री बोलने पर' एक शब्द-शंखनाद की तरह है। उन्होंने टिप्पणी की कि वे इस कविता संग्रह का नाम 'अकेलेपन का उत्सव' रखना पसंद करते। उन्होंने यह सुझाव भी दिया कि आधुनिक पाठकों व भावी पीढ़ियों तक सहज पहुंच के लिए भाषा को और अधिक सरल व बहता हुआ होना चाहिए। साथ ही, कविता संग्रह को विभिन्न खंडों में विभाजित करने और शीर्षक चयन में विशेष सावधानी बरतने का परामर्श दिया। उन्होंने संग्रह से 'ईश्वर जैसा' और 'पिता' कविताओं का वाचन किया और कहा कि स्त्री का मुखर होकर लिखना हमारे समय की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है।


कार्यक्रम का कुशल व प्रभावी संचालन वरिष्ठ कवयित्री प्रीति दुबे द्वारा किया गया। चक्रपाणि दत्त मिश्र, राकेश पाठक, कनिष्क मिश्र, अमर कौर चड्ढा, निष्ठा मिश्र एवं इंदू मिश्र का भावभीना स्वागत किया गया। इस साहित्यिक आयोजन में नगर के प्रबुद्ध जनों और साहित्य-प्रेमियों ने बड़ी संख्या में उपस्थिति दर्ज कराई। अंत में चक्रपाणि दत्त मिश्र ने उपस्थित सभी सुधी पाठकों एवं साहित्य-अनुरागियों के प्रति धन्यवाद एवं आभार व्यक्त किया।

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