प्रो.( डॉ.) अनिल नौसरान
नित्य संदेश, मेरठ। उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती केवल चिकित्सकों की संख्या नहीं, बल्कि चिकित्सकों की कार्यक्षमता, स्वास्थ्य और सेवाओं की गुणवत्ता भी है। यह चर्चा महत्वपूर्ण है कि 50 वर्ष से अधिक आयु के अनेक चिकित्सक स्वयं विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। यदि सरकार ने चिकित्सकों की सेवा-आयु बढ़ाकर 70 वर्ष करने का निर्णय लिया है, तो इसके साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठता है—क्या केवल सेवा-आयु बढ़ाने से स्वास्थ्य सेवाएँ मजबूत होंगी?
सरकार को उम्र के बजाय कार्यक्षमता को आधार बनाना चाहिए। जो चिकित्सक शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह सक्षम हैं, स्वस्थ हैं और मरीजों को गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ देने की क्षमता रखते हैं, उनके अनुभव का निश्चित रूप से लाभ लिया जाना चाहिए। अनुभवी चिकित्सक किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण पूंजी होते हैं। लेकिन यदि कोई चिकित्सक स्वास्थ्य संबंधी कारणों से नियमित और प्रभावी रूप से अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने में सक्षम नहीं है, तो उसके लिए सम्मानजनक स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति अथवा उपयुक्त वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य किसी वरिष्ठ चिकित्सक का अपमान नहीं, बल्कि मरीजों के हित और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना होना चाहिए। इसके साथ-साथ सरकार को बड़ी संख्या में युवा, योग्य और प्रशिक्षित चिकित्सकों की पारदर्शी एवं समयबद्ध भर्ती करनी चाहिए। इससे एक ओर अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी दूर होगी, वहीं दूसरी ओर नई पीढ़ी के चिकित्सकों को अवसर मिलेगा और स्वास्थ्य व्यवस्था में नई ऊर्जा आएगी।
समाधान केवल सेवा-आयु बढ़ाना नहीं है, एक मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए आवश्यक है:
- चिकित्सकों की नियमित स्वास्थ्य एवं कार्यक्षमता का मूल्यांकन हो।
- सक्षम वरिष्ठ चिकित्सकों के अनुभव का पूरा लाभ लिया जाए।
- कार्य करने में असमर्थ कर्मचारियों के लिए सम्मानजनक वैकल्पिक व्यवस्था हो।
- रिक्त पदों पर युवा चिकित्सकों की नियमित भर्ती हो।
- मरीजों की सुरक्षा और गुणवत्तापूर्ण उपचार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
- पदोन्नति और सेवा-विस्तार में उम्र के साथ-साथ स्वास्थ्य, दक्षता और कार्य-प्रदर्शन को भी महत्व दिया जाए।
वरिष्ठता सम्मान की पात्र है, लेकिन चिकित्सा सेवा में मरीजों की सुरक्षा सर्वोच्च है। सरकार को ऐसा संतुलन बनाना होगा जिसमें अनुभव भी बचे, युवा प्रतिभा को अवसर भी मिले और मरीजों को सक्षम चिकित्सक भी मिलें। आखिर सवाल केवल यह नहीं है कि चिकित्सक कितने वर्ष तक सेवा में रहे— सवाल यह है कि वह कितने प्रभावी, सक्षम और स्वस्थ होकर मरीजों की सेवा कर पा रहे हैं। क्या केवल सेवा-आयु बढ़ाने से उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएँ तंदुरुस्त होंगी, या हमें कार्यक्षमता और नई भर्ती पर भी गंभीरता से ध्यान देना होगा? सोचिए… सवाल किसी व्यक्ति का नहीं, पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था और लाखों मरीजों के भविष्य का है।

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