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Saturday, September 26, 2026

विकसित भारत का आधार केवल आर्थिक समृद्धि नहीं, ज्ञान, चरित्र और कौशल से युक्त नागरिक निर्माण है: रामदत्त चक्रधर



ज्ञान के साथ विनम्रता, सफलता के साथ संवेदनशीलता और प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग की भावना ही विकसित भारत की पहचान: प्रो. संगीता शुक्ला


नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास (पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र) के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित दो दिवसीय ‘ज्ञानसभा मेरठ-2026’ के उदघाटन सत्र में विकसित भारत के निर्माण में शिक्षा की भूमिका, भारतीय ज्ञान परंपरा, चरित्र निर्माण, कौशल विकास, नैतिक मूल्यों तथा युवा पीढ़ी की जिम्मेदारी पर गहन मंथन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि श्री रामदत्त चक्रधर, बीज वक्ता डॉ. अतुल कोठारी तथा अध्यक्षीय उद्बोधन में विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का प्रमुख माध्यम बताते हुए समग्र और मूल्य आधारित शिक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।


अतीत के गौरव, वर्तमान की पीड़ा और भविष्य के सपनों से बनता है विकसित राष्ट्र: रामदत्त चक्रधर

मुख्य अतिथि श्री रामदत्त चक्रधर सह सर कार्यवाह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कहा कि किसी भी देश को आगे बढ़ाने के लिए उसके नागरिकों के मन में अतीत के गौरव का बोध, वर्तमान की चुनौतियों की पीड़ा और भविष्य के सपने होने चाहिए। विकसित भारत की कल्पना स्पष्ट होनी चाहिए। भारत को केवल अमेरिका या किसी अन्य देश की नकल के रूप में विकसित करने के बजाय उसकी अपनी जीवन-दृष्टि और भारतीय मूल्यों के आधार पर विकास का मॉडल तैयार करना होगा। उन्होंने कहा कि भारत की विकास दृष्टि भोग प्रधान नहीं, संयम प्रधान होनी चाहिए। भारत की विशेषता यह रही है कि उसने पूरी दुनिया को बाजार के रूप में नहीं, बल्कि परिवार के रूप में देखा है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की भावना भारतीय चिंतन का आधार रही है। श्री चक्रधर ने कहा कि भारत ने संकट के समय सदैव मानवता को प्राथमिकता दी है। विभिन्न देशों में संकट के समय भारतीयों के साथ-साथ दूसरे देशों के नागरिकों को भी सुरक्षित निकालने के अनेक उदाहरण भारत की इसी मानवीय दृष्टि को प्रदर्शित करते हैं। कोरोना काल में भी भारत ने अनेक देशों को वैक्सीन और आवश्यक दवाओं की सहायता उपलब्ध कराई।उन्होंने कहा कि भारत की शक्ति केवल आर्थिक या सैन्य सामर्थ्य में नहीं, बल्कि नैतिकता, चरित्र और मानवीय मूल्यों में है। भारत ने अपनी सभ्यता के विस्तार के लिए किसी दूसरे देश को गुलाम बनाने का रास्ता नहीं अपनाया। इसलिए विकसित भारत का लक्ष्य ऐसा राष्ट्र बनाना होना चाहिए जो अपनी शक्ति का उपयोग मानवता के कल्याण के लिए करे।



शिक्षा का लक्ष्य केवल डिग्री और रोजगार नहीं, चरित्रवान नागरिक का निर्माण भी  : चक्रधर

श्री रामदत्त चक्रधर ने कहा कि विकसित भारत के निर्माण का सबसे बड़ा माध्यम शिक्षा है। आज हमारे पास वैज्ञानिक, इंजीनियर, चिकित्सक और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ तो तैयार हो रहे हैं, लेकिन शिक्षा व्यवस्था के सामने यह प्रश्न भी होना चाहिए कि क्या हम अच्छे और चरित्रवान मनुष्य तैयार कर पा रहे हैं। उन्होंने शिक्षकों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि संस्कार केवल किताबों और पाठ्यक्रमों से नहीं, बल्कि शिक्षक के जीवन के उदाहरण से आते हैं। शिक्षक जैसा स्वयं आचरण करता है, विद्यार्थी उसी से सीखता है। इसलिए शिक्षकों को अपने जीवन में ईमानदारी, अनुशासन, संवेदनशीलता और कर्तव्यनिष्ठा का उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। उन्होंने कहा कि देश को प्रति व्यक्ति आय (per capita income) के साथ-साथ प्रति व्यक्ति चरित्र (per capita character) की दिशा में भी सोचना होगा। आज विश्वास और चरित्र का संकट दिखाई देता है, जिसका समाधान शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। श्री चक्रधर ने कहा कि प्रत्येक विश्वविद्यालय और महाविद्यालय को ऐसा मॉडल प्रस्तुत करना चाहिए, जिसमें विद्यार्थी ज्ञान और कौशल के साथ समाज, राष्ट्र और मानवता के प्रति अपने दायित्व को समझें। युवा भारत का भविष्य हैं और उन्हें उचित दिशा तथा संस्कार प्रदान करना शिक्षा व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।


भौतिक विकास के साथ आध्यात्मिक और नैतिक विकास भी जरूरी :  डॉ. अतुल कोठारी

बीज वक्तव्य देते हुए डॉ. अतुल कोठारी ने कहा कि भारत तेजी से विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी, मोबाइल निर्माण और अनेक क्षेत्रों में भारत की उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं। लेकिन केवल भौतिक प्रगति को ही विकास मान लेना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण संकट, नैतिक मूल्यों में गिरावट, चरित्र संकट और सामाजिक समस्याएं बढ़ रही हैं तो विकास की दिशा पर भी चिंतन आवश्यक है। विकास के भौतिक और आध्यात्मिककृदोनों पक्षों के संतुलन पर विचार करना होगा। डॉ. कोठारी ने कहा कि भारतीय दृष्टि में धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह कर्तव्य और सामाजिक दायित्व की भावना से जुड़ा रहा है। भारतीय परंपरा में अर्जित संपत्ति को केवल व्यक्तिगत उपभोग का साधन नहीं माना गया, बल्कि समाज के हित में उसके उपयोग की भावना रही है।



उन्होंने कहा कि देश का विकास केवल सरकार के प्रयासों से संभव नहीं है। 140 करोड़ नागरिकों की अपनी-अपनी भूमिका और जिम्मेदारी है। उद्योग, शिक्षा, पत्रकारिता, प्रशासन, विद्यार्थी और समाज के प्रत्येक वर्ग को अपनी भूमिका ईमानदारी और निष्ठा से निभानी होगी। डॉ. कोठारी ने कहा कि प्रत्येक विश्वविद्यालय को यह चिंतन करना चाहिए कि देश के विकास में उसके संस्थान का क्या योगदान हो सकता है। छोटी-छोटी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाना भी राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत का अर्थ दुनिया का प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि ऐसा राष्ट्र बनाना है जो विश्व में संकटग्रस्त मानवता के उत्थान में सहयोग करे। भारत की विश्वगुरु की संकल्पना ज्ञान, चरित्र और कौशल के त्रिवेणी संगम पर आधारित होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था ऐसी हो, जिससे देश को अच्छे वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य विशेषज्ञों के साथ-साथ संस्कारवान, चरित्रवान और मूल्यवान नागरिक भी मिलें। रोजगार और विकास के बीच संतुलन बनाने तथा पर्यावरण और मानवता के अनुकूल विकास मॉडल प्रस्तुत करने की क्षमता भारत में है।



मानव निर्माण से होगा विकसित भारत का वास्तविक निर्माण: प्रो. संगीता शुक्ला

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो0 संगीता शुक्ला ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि भारत का भविष्य आने वाली पीढ़ियों के निर्माण से जुड़ा है और इस निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम शिक्षा है। हमें यह विचार करना होगा कि हम अपने बच्चों को क्या सिखा रहे हैं, उनमें कौन से मूल्य विकसित कर रहे हैं और उन्हें किस प्रकार के नागरिक के रूप में तैयार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि 2047 के विकसित भारत का वास्तविक निर्माण मानव निर्माण से होगा। शिक्षा में कौशल के साथ संस्कार, अधिकारों के साथ कर्तव्यबोध और ज्ञान के साथ जिम्मेदारी की भावना विकसित करनी होगी। कुलपति ने बताया कि चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में वैदिक गणित, भारतीय दर्शन, स्वास्थ्य विज्ञान, पारंपरिक ज्ञान, शोध एवं नवाचार जैसे क्षेत्रों को शिक्षा से जोड़ने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। विश्वविद्यालय में क्रिएटर, इनोवेशन लैब, इन्क्यूबेशन सेंटर, उद्योगों के साथ सहभागिता और कौशल विकास जैसी पहल विद्यार्थियों को केवल ज्ञान प्राप्त करने से आगे बढ़कर समस्या समाधान और नवाचार की दिशा में ले जा रही हैं।


उन्होंने कहा कि मातृभाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान और चिंतन प्रक्रिया की वाहक है। भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पाठ्य सामग्री, डिजिटल लर्निंग तथा वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली को सहज रूप में उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। प्रो. शुक्ला ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान को शोध एवं नवाचार की आधुनिक पद्धतियों के साथ जोड़ते हुए ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करनी होगी, जो विद्यार्थियों को राष्ट्रीय और वैश्विक अवसरों से जोड़े। उन्होंने कहा कि भविष्य का विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने वाला संस्थान नहीं, बल्कि ज्ञान का सृजनकर्ता, तकनीकी समाधान विकसित करने वाला, सक्षम और जिम्मेदार नागरिक तैयार करने वाला केंद्र होना चाहिए।


कुलपति ने कहा कि विकसित भारत की संकल्पना में ज्ञान के साथ विनम्रता, सफलता के साथ संवेदनशीलता और प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग की भावना आवश्यक है। विकसित भारत केवल सरकार का लक्ष्य नहीं, बल्कि युवाओं और प्रत्येक नागरिक का भी संकल्प होना चाहिए। उन्होंने कहा कि “ज्ञान हमारा पथ, संस्कार हमारी शक्ति, नवाचार हमारी गति और राष्ट्रसेवा हमारा संकल्प” बने। इसी भावना के साथ शिक्षित भारत से सक्षम भारत, सक्षम भारत से समृद्ध भारत और समृद्ध भारत से विकसित भारत की यात्रा को आगे बढ़ाया जा सकता है।  ज्ञानसभा में शिक्षा के माध्यम से चरित्रवान, ज्ञानवान, कौशलयुक्त और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी युवा तैयार करने तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा, शोध और नवाचार से जोड़ने की आवश्यकता पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया। कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर कृष्णकांत शर्मा ने किया जबकि अतिथियों का परिचय प्रोफेसर अनिल मलिक ने कराया। स्वागत उद्बोधन प्रोफेसर शिवराज पुंडीर ने दिया। इस अवसर प्रोफेसर इंचार्ज मीडिया सेल प्रोफेसर मुकेश कुमार शर्मा, प्रेस प्रवक्ता मितेंद्र कुमार गुप्ता इंजीनियर प्रवीण पवार सहित विश्वविद्यालय के सभी शिक्षक, अधिकारी , कर्मचारी छात्र छात्राएं मौजूद रहे।


युवाओं से संवाद 

ज्ञान सभा 2026 में दूसरा सत्र सामूहिक रूप से रखा गया। एक सत्र ज्ञान सभा में आए शिक्षा संस्कृति न्यास के कार्यकर्ताओं के साथ सह सर कार्यवाह रामदत्त चक्रधर ने ज्ञान से जीवन तक (ऐसी शिक्षा जो बच्चों को पढाए ही नहीं जीना भी सिखाए) विषय पर सभी से वार्ता की तथा दूसरा सामूहिक सत्र अटल सभागार चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के छात्र छात्राओं के साथ युवा संवाद युवा नवाचार उद्यमिता विकसित भारत 2047 की ओर विषय पर वार्ता की। इस दौरान छात्र छात्राओं के जिज्ञासाओं का भी समाधान किया गया। 


चार समूह में हुई वार्ता 

भोजन के पश्चात सत्रों को चार भागों में बांटा गया। इसके एक समूह छात्रों का जिसमें विद्यार्थी से व्यक्तित्व तक कैसी शिक्षा बनाएगी आत्मविश्वासी, चरित्रवान और जिम्मेदार विषय पर देशराज शर्मा अखिल भारतीय महामंत्री विद्या भारती का उदबोधन तथा प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम किया गया। दूसरे समूह में स्कूल शिक्षक थे जिसमें गुरू से राष्ट्र-निर्माता तक 21 सदी का शिक्षक कैसा हो विषय पर उमेश सिंह पूर्व निदेशक मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी का उदबोधन तथा जिज्ञासा एवं सामाधान कार्यक्रम हुआ। तीसरा समूह प्रोफेसर का रखा गया था जिसमें स्कूल अकेला नहीं बना सकता संस्कार परिवार, विद्यालय और समाज की साझी जिम्मेदारी विषय पर उमाशंकर पचौरी राज्य सूचना आयुक्त मध्य प्रदेश का उदबोधन तथा जिज्ञासा एवं सामाधान कार्यक्रम हुआ। जबकि चौथा समूह अन्य का बनाया गया था। जिसमें व्यवस्था तकनीक एवं राष्ट्र विषय पर प्रो0 सचिन माहेश्वरी का उदबोधन तथा जिज्ञासा एवं सामाधान कार्यक्रम हुआ। इसी प्रकार शाम के समय भी चार समूह बनाकर विभिन्न विषयों पर विद्धानों के उदबोधन कार्यक्रम हुए।

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