भीम आर्मी स्टूडेंट फेडरेशन के पश्चिमी यूपी प्रभारी को तीन माह के लिए मेरठ से किया बाहर, छात्र आंदोलनों में दर्ज मुकदमों को बनाया गया आधार?
वसीम अहमद
नित्य संदेश, किठौर। थाना क्षेत्र के मौहल्ला मोसमखानी निवासी तथा चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में सक्रिय और भीम आर्मी स्टूडेंट फेडरेशन के पश्चिमी उत्तर प्रदेश प्रभारी शान मुहम्मद के खिलाफ पुलिस-प्रशासन ने गुंडा एक्ट के तहत जिलाबदर की कार्रवाई की है। उन्हें तीन माह के लिए मेरठ जिले की सीमा से बाहर रहने का आदेश दिया गया है। कार्रवाई के बाद पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली और छात्र आंदोलनों से जुड़े मुकदमों को आधार बनाए जाने को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। शान मुहम्मद पिछले कई वर्षों से विश्वविद्यालय और छात्र हितों से जुड़े मुद्दों को लेकर सक्रिय रहे हैं। उन्होंने विद्यार्थियों की समस्याओं, फीस, छात्र अधिकारों और सामाजिक मुद्दों को लेकर कई बार आंदोलन और प्रदर्शन किए। इन आंदोलनों के दौरान उनके खिलाफ लगभग आधा दर्जन से अधिक मुकदमे दर्ज होने की बात सामने आई है। शान मुहम्मद के समर्थकों का कहना है कि इन मामलों में कई मुकदमे आंदोलन और प्रदर्शन से जुड़े हैं।
आंदोलन किया तो मुकदमा, अब मुकदमों के आधार पर जिलाबदर?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी छात्र नेता के खिलाफ दर्ज मुकदमों की पृष्ठभूमि छात्र आंदोलनों और प्रदर्शन से जुड़ी रही है तो क्या उन्हीं मुकदमों को आधार बनाकर जिलाबदर जैसी कठोर प्रशासनिक कार्रवाई की जानी चाहिए? समर्थकों का आरोप है कि शान मुहम्मद लगातार विद्यार्थियों की आवाज उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय में छात्र हितों को लेकर होने वाले आंदोलनों को कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखने के बजाय प्रशासन को उनकी मांगों और आंदोलन की पृष्ठभूमि पर भी विचार करना चाहिए।
आईआईएमटी छात्रा प्रकरण में भी रातभर दिया था धरना
मेरठ के गंगानगर में स्थित आईआईएमटी विश्वविद्यालय में छात्रा की आत्महत्या के मामले में भी शान मुहम्मद अपने साथियों के साथ विश्वविद्यालय पहुंचे थे। छात्रा को न्याय दिलाने समेत अन्य मांगों को लेकर उन्होंने रातभर धरना दिया था। इस मामले में भी पुलिस कार्रवाई और मुकदमे का सामना करना पड़ा। अब सवाल यह है कि छात्रों की समस्याओं को लेकर किए गए आंदोलनों में दर्ज मुकदमों को क्या सामान्य आपराधिक गतिविधियों के समान मानकर जिलाबदर की कार्रवाई का आधार बनाया जा सकता है?
कार्रवाई के पीछे कानून-व्यवस्था या छात्र राजनीति?
पुलिस-प्रशासन की ओर से जिलाबदर की कार्रवाई को कानून-व्यवस्था से जुड़ी प्रक्रिया बताया जा रहा है लेकिन छात्र राजनीति से जुड़े लोगों के बीच यह कार्रवाई चर्चा का विषय बन गई है। समर्थकों व छात्रों का कहना है कि यदि किसी छात्र नेता पर गंभीर आपराधिक गतिविधियों के ठोस आरोप हैं तो प्रशासन को उनकी पूरी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कार्रवाई वास्तव में कानून-व्यवस्था के लिए है या फिर छात्र आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाने का परिणाम। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या छात्र हितों की आवाज उठाने वाले आंदोलनों को लगातार मुकदमों के दायरे में लाकर पहले छात्र नेता पर मामले दर्ज किए जाएं और बाद में उन्हीं मुकदमों को आधार बनाकर जिलाबदर कर दिया जाए? यदि ऐसा है तो फिर लोकतांत्रिक छात्र आंदोलनों और आपराधिक गतिविधियों के बीच अंतर कैसे तय होगा?

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