नित्य संदेश
पर्युषण पर्व केवल मंदिर जाने, पूजा करने या धार्मिक नियमों का पालन करने का अवसर नहीं है, बल्कि अपने भीतर झांकने और यह देखने का समय है कि हमारे व्यवहार में क्या बदला जाना चाहिए। दिगंबर जैन परंपरा में पर्युषण के दूसरे दिन ‘उत्तम मार्दव धर्म’ का चिंतन किया जाता है। मार्दव अर्थात मन की कोमलता, विनम्रता और मान-अहंकार का त्याग।
सुनने में यह एक आध्यात्मिक शब्द लगता है, लेकिन यदि हम इसे अपने दैनिक जीवन में देखें तो यह हमारे आसपास हर दिन दिखाई देता है।
कई बार घर में किसी बात पर हमारी बात सही होती है, फिर भी हम चाहते हैं कि सामने वाला हमारी बात माने। पति-पत्नी के बीच छोटी-सी बात बहस का रूप ले लेती है। दोनों जानते हैं कि बात बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन कोई भी पहला कदम उठाने को तैयार नहीं होता। ऐसे समय में समस्या बात की नहीं, ‘मैं क्यों झुकूं?’ की होती है। यही वह क्षण है जहां उत्तम मार्दव हमारे सामने एक रास्ता रखता है।
विनम्र होने का अर्थ यह नहीं कि हम हमेशा गलत बात स्वीकार कर लें। इसका अर्थ केवल इतना है कि सही होने के बावजूद हमें दूसरे को छोटा दिखाने की आवश्यकता महसूस न हो।
इसी तरह कार्यालय में किसी कर्मचारी ने कोई सुझाव दिया। अधिकारी के पास अधिक अनुभव है और उसे लगता है कि उसका निर्णय ही सही है। लेकिन यदि वह कनिष्ठ कर्मचारी की बात भी ध्यान से सुन लेता है और उसमें कोई उपयोगी बात हो तो उसे स्वीकार कर लेता है, तो यह विनम्रता है।
कभी-कभी घर में काम करने वाले व्यक्ति से हम कठोरता से बात कर देते हैं। वह हमारे लिए रोज़ छोटे-छोटे काम करता है, लेकिन हम उसे धन्यवाद देना भी जरूरी नहीं समझते। क्यों? क्योंकि मन के किसी कोने में हमने उसके काम को अपने से ‘छोटा’ मान लिया है।
किसी बच्चे को परीक्षा में बहुत अच्छे अंक मिलते हैं। माता-पिता स्वाभाविक रूप से खुश होते हैं। लेकिन यदि वे दूसरे बच्चों के सामने कहने लगें—“हमारा बच्चा सबसे होशियार है”—तो धीरे-धीरे उपलब्धि के साथ अहंकार जुड़ सकता है।
उत्तम मार्दव हमें उपलब्धि का आनंद लेने से नहीं रोकता। वह केवल यह सिखाता है कि सफलता हमारे भीतर श्रेष्ठता का भाव पैदा न करे।
विनम्रता का सबसे सुंदर उदाहरण शायद घर में ही मिलता है। एक मां पूरे परिवार के लिए दिनभर काम करती है। फिर भी अक्सर उसके काम को ‘तो यह तो उसका काम है’ कहकर सामान्य मान लिया जाता है। एक दिन यदि परिवार का कोई सदस्य केवल इतना कह दे—“आज आपने बहुत काम किया, धन्यवाद”—तो यह छोटा-सा वाक्य रिश्ते में कितनी गर्माहट ला सकता है। मार्दव इसी संवेदनशीलता का नाम है।
कई बार हम अपनी गलती स्वीकार करना चाहते हुए भी केवल इसलिए ‘मुझे गलती हो गई’ नहीं कह पाते क्योंकि हमें लगता है कि इससे हमारी प्रतिष्ठा कम हो जाएगी। लेकिन वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है।गलती स्वीकार करने से व्यक्ति छोटा नहीं होता। बल्कि अपनी गलती स्वीकार करने का साहस उसके व्यक्तित्व को और बड़ा बनाता है।
एक सरल प्रयोग हम आज से कर सकते हैं। जब भी किसी विवाद में हमें लगे कि “मैं सही हूं”, उसी समय खुद से एक प्रश्न पूछें—“क्या मेरा सही होना इतना जरूरी है कि सामने वाले को गलत साबित करना भी जरूरी हो?” हो सकता है उत्तर ‘नहीं’ हो। दूसरा प्रयोग करें—आज किसी ऐसे व्यक्ति की बात ध्यान से सुनिए जिसकी बात आप सामान्यतः अनदेखी कर देते हैं। तीसरा—आज किसी ऐसे व्यक्ति को धन्यवाद दीजिए जिसके योगदान को हम अक्सर स्वाभाविक मान लेते हैं। और चौथा—यदि कहीं हमारी गलती है तो बिना कोई बहाना बनाए केवल इतना कह दीजिए—“हां, यहां मुझसे गलती हुई।” ये छोटे-छोटे अभ्यास हमारे भीतर के ‘मैं’ को थोड़ा हल्का कर सकते हैं।
उत्तम मार्दव का अर्थ स्वयं को कमतर समझना नहीं है। यह आत्मसम्मान छोड़ना भी नहीं है। आत्मसम्मान और अहंकार में अंतर है।
आत्मसम्मान कहता है—“मैं भी महत्वपूर्ण हूं।” अहंकार कहता है—“सिर्फ मैं ही महत्वपूर्ण हूं।” विनम्रता कहती है—“मैं महत्वपूर्ण हूं, लेकिन सामने वाला भी उतना ही महत्वपूर्ण है।” शायद पर्युषण के दूसरे दिन का सबसे व्यावहारिक संदेश यही है कि जीवन में हर जगह अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है।
कभी घर में एक कदम पीछे हट जाना, कभी किसी छोटे व्यक्ति की बात सुन लेना, कभी अपनी गलती स्वीकार कर लेना, कभी किसी की सफलता से ईर्ष्या करने के बजाय उसे बधाई देना—ये सभी उत्तम मार्दव के छोटे-छोटे रूप हैं। विनम्रता कोई कमजोर व्यक्ति का गुण नहीं है। अपने ‘मैं’ को नियंत्रित कर पाना ही वास्तविक आंतरिक शक्ति है।
पर्युषण हमें बाहर की दुनिया बदलने से पहले अपने भीतर देखने का अवसर देता है। और शायद उत्तम मार्दव की शुरुआत वहीं से होती है—“मुझे हर बार सही साबित नहीं होना है, मुझे हर बार बड़ा दिखना नहीं है, बस इतना प्रयास करना है कि मेरे कारण कोई छोटा महसूस न करे।”
डाॅ. प्रगति जैन,
इंदौर (म.प्र.)


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