
नित्य संदेश। 3 एवं 4अक्टूबर को होने वाले युवा इतिहासकारों के शोध लेखन, शोध प्रारूप एवं कार्ययोजना पर एक बैठक सह कार्यशाला का आयोजन अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के केंद्रीय कार्यालय के "सभागार "में सम्पन्न हुआ।
इस कार्यशाला के मुख्य अतिथि एवं मार्गदर्शक डॉ.बालमुकुंद पांडे रहे। उनका कहना हैं कि युवा इतिहासकारों एवं युवा समाज वैज्ञानिकों का इतिहास के पुनर्लेखन एवं नया आयाम देने में महत्वपूर्ण भूमिका है। युवाओं के योगदान से भारत "उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था" के रूप में विकसित हों रहा है। यहां 15 से 29 वर्ष आयु- वर्ग के ऊर्जावान, कार्यशील और राष्ट्रहित के प्रति युवा रहते हैं। ये युवा देश की एकता और अखंडता को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। समाज के विकास ,राष्ट्र- निर्माण एवं लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को सशक्त बनाने के लिए युवाओं का नेतृत्व और उनकी सक्रिय भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। युवाओं में नवाचार, परिवर्तन और नई सोच की अपार क्षमता होती है, यही कारण है कि वह सामाजिक समस्याओं के समाधान के वाहक, सामाजिक परिवर्तन के प्रेरक तथा समाज के लिए प्रेरणादायक और प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं। भारत की विशाल युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी मानव शक्ति है। यदि इस शक्ति का सही दिशा में उपयोग किया जाए तो देश की चुनौतियों का प्रभावी समाधान कर "भारत को एक विकसित, समृद्ध और आत्मनिर्भर राष्ट्र " बनाने में महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है।
युवाओं के भीतर उत्साह,कार्य करने का जुनून और चुनौतियों का सामना करने का अदम्य साहस और अपार ऊर्जा होती है, उनमें कठिन परिश्रम करने की अपार क्षमता ,अपने सपनों को साकार करने का दृढ़ मनोबल होता है। युवाओं की व्यक्तिगत सफलता न केवल उनके जीवन को नई दिशा देती है, बल्कि उनकी उपलब्धियां राष्ट्र की प्रगति और सफलता में भी महत्वपूर्ण योगदान करती हैं। भारत ने वर्ष 2047 तक देश को "विकसित राष्ट्र" बनाने का संकल्प लिया है। इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य की प्राप्ति में युवाओं की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में भारत विश्व की तेजी से उभरते अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और देश में आधारभूत संरचना, प्रौद्योगिकी, शिक्षा ,नवाचार तथा रोजगार के क्षेत्र में विकास की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।
विकसित भारत का निर्माण केवल आर्थिक उपलब्धियों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए ऐसे जागरूक नागरिकों की आवश्यकता है जो संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों को अपने व्यवहार में उतारें। आज के युवाओं को अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी सजग होना होगा। सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, महिला सम्मान, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास जैसे मूल्यों का पालन विकसित भारत की आधारशिला को और अधिक सुदृढ़ बनाता है।
बैठक सह कार्यशाला के मुख्य वक्ता डॉ.रत्नेश कुमार त्रिपाठी,राष्ट्रीय मंत्री ने युवा इतिहासकारों से इतिहास के पुनर्लेखन के लिए मानविकी एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाने के लिए प्रेरित किए।उनका कहना है कि समय की आवश्यकता को देखते हुए युवाओं को विवेकीय प्रज्ञा से कार्य करने की आवश्यकता है। कार्यशाला सह बैठक को डॉ.नरेंद्र शुक्ला,अखिल भारतीय लेखक परिषद के सदस्य ने आगामी युवा इतिहासकार सम्मेलन के लिए ऊर्जावान स्तर पर कार्य करने के लिए सभी को आवेशित एवं प्रोत्साहित किए।उन्होंने कहा कि हम सभी को हृदय से युवा इतिहासकार सम्मेलन की सफल बनाने के लिए युद्धस्तर पर प्रयास करने की आवश्यकता है।उन्होंने सम्मेलन में युवाओं की अधिकतम भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किए।
बैठक सह कार्यशाला को दिल्ली प्रांत के महासचिव डॉ.निर्मल पाण्डेय जी संबोधित किए।उन्होंने सबको कार्य करने के लिए प्रेरित एवं आत्मीयता प्रकट किए।सभी को तत्परता से शोध सारांश एवं अपने आगमन एवं प्रस्थान हेतु त्वरित स्तर पर मन को मजबूत बनाने के लिए प्रेरित किए। बैठक सह कार्यशाला की अध्यक्षता प्रोफेसर (डॉ) धर्मचंद चौबे ने किए।उन्होंने बैठक में उपस्थित एवं आए सभी को हृदय तल से आभार एवं धन्यवाद दिए।उन्होंने शोध पत्र लेखन के लिए सबको प्रोत्साहित किए।उन्होंने कहा कि शोध पत्र लेखन में समस्याओं को निराकरण वे हर समय उपस्थित रहेंगे।
बैठक सह कार्यशाला का डायस संचालन डॉ.प्रदीप कुमार उपाध्याय ,युवा इतिहासकार आयाम के सदस्य ने किया।उन्होंने सासाराम में होनेवाले युवा इतिहासकार सम्मेलन में सबको आने के लिए निवेदन किए । बैठक सह कार्यशाला में डॉ.सुधाकर कुमार मिश्रा, डॉ.साधना कुशवाहा, डॉ.रीना कपूर, डॉ.सचिन रतन झा, डॉ.पीयूष मिश्रा, डॉ. अस्मित शर्मा, डॉ.बमबम जी, डॉ.रमाकांत दुबे , डॉ.सत्यप्रकाश एवं श्री मुकेश उपाध्याय की गरिमामई उपस्थिति रही। कार्यक्रमोंपरांत स्वादिष्ट जलपान की व्यवस्था श्री जितेंद्र जी एवं उनके सहयोगी ने करवाए।
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