-लाक्षागृह, सिनौली और पुरा महादेव... इतिहास से पर्यटन तक का सफर
लियाकत मंसूरी
नित्य संदेश, बागपत। महाभारत कालीन इतिहास, सिंधु घाटी सभ्यता और 1857 की क्रांति की विरासत को स्वयं में समेटे बागपत जिला 17 सितंबर को अपना स्थापना दिवस मनाएगा। वर्ष 1997 में मेरठ से अलग होकर अस्तित्व में आए बागपत ने 29 वर्षों के सफर में विकास की नई इबारत लिखी है। कभी पर्यटन के लिहाज से सीमित पहचान रखने वाला यह जनपद आज अपने पौराणिक, ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों के चलते पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में उभर रहा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने पर्यटन विकास की विभिन्न
परियोजनाओं के माध्यम से महाभारत सर्किट के अभिन्न हिस्से बागपत को पर्यटन
मानचित्र पर विशिष्ट पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। जनपद
बागपत का नाम पहले 'बागपत' नहीं था। महाभारत काल में इसे व्याघ्रप्रस्थ (बाघों की
भूमि) के नाम से जाना जाता था। समय के साथ व्याघ्रप्रस्थ का नाम बागपत पड़ा। पूर्व
में इस क्षेत्र में फलों के सघन बाग भी रहे हैं। जिले के नाम को उससे भी जोड़ा जाता
है। महाभारत सर्किट के प्रमुख स्थलों में शामिल बागपत के बड़ौत स्थित लाक्षागृह,
जहां पांडवों को जलाने की कोशिश की गई थी, महाभारतकालीन इतिहास से परिचय कराता है।
वहीं सिनौली गांव में हुई पुरातात्विक खुदाई में मिले सिंधु कालीन अवशेष, मानव
कंकाल, तलवारें और शाही रथ यहां की प्राचीन सभ्यता और विरासत की कहानी बयां करते
हैं। इसके अलावा, रटौल गांव, बालैनी, पुरा महादेव, परशुरामखेड़ा, सिंघावली
अहीर गांव, बामनौली और रंछाड़ स्वयं में इतिहास की अनगिनत कहानियां बिखरी
हैं।
श्री कृष्ण ने पांडवों के लिए कौरवों से मांगा था 'व्याघ्रप्रस्थ'
महाभारत का युद्ध खत्म करने के लिए श्री कृष्ण ने कौरवों से पांडवों के लिए
जिन पांच गांव देने का प्रस्ताव रखा था, उसमें व्याघ्रप्रस्थ (वर्तमान बागपत) भी
था। इनके अतिरिक्त पानीपत, सोनीपत, इंद्रप्रस्थ और तिलपत थे।
हालांकि, पांडवों के प्रस्ताव को दुर्योधन ने ठुकरा दिया, फलस्वरूप महाभारत
युद्ध हुआ। वहीं, बागपत जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर बरनावा (वारणावत)
स्थित पांडवकालीन लाक्षागृह ऐतिहासिक धरोहर के रूप में लोगों का ध्यान आकर्षित
करता है। बागपत-मेरठ हाईवे के पास बने एक प्रवेश द्वार से होकर मुख्य स्थल तक पहुंचा
जाता है। इसी द्वार से लाक्षागृह की पुरानी इमारत साफ दिखाई देती है। फिलहाल यह
स्थल एएसआई के अधीन है।
धार्मिक और ग्रामीण पर्यटन को रफ्तार: जयवीर सिंह
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि 'मुख्यमंत्री योगी
आदित्यनाथ के नेतृत्व में बागपत की समृद्ध विरासत को पर्यटन मानचित्र पर विशिष्ट
पहचान दिलाने का प्रयास किया जा रहा है। इसी क्रम में पर्यटन विभाग ने वित्त वर्ष
2025-26 में राज्य योजना के तहत जनपद में कुल 431 लाख रुपए की पर्यटन विकास
परियोजनाएं स्वीकृत की हैं। इन परियोजनाओं के माध्यम से जिले के प्रमुख स्थलों का
विकास किया जाएगा। उन्होंने बताया कि बागपत में धार्मिक एवं ग्रामीण पर्यटन
को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं। ग्राम पुरा महादेव
में ग्रामीण पर्यटन विकास के लिए 116 लाख, त्रिलोक तीर्थ धाम के लिए 124.56 लाख और
पुरा महादेव मंदिर के समीप परशुराम मंदिर के पर्यटन विकास के लिए 190.48 लाख रुपए
स्वीकृत किए गए हैं।
स्वतंत्रता संग्राम से धार्मिक पर्यटन तक
सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भी बागपत (तब मेरठ जिला) का महत्वपूर्ण
योगदान रहा। यहां के किसानों और वीरों ने बढ़-चढ़कर योगदान दिया। तब बड़ौत
स्थित पट्टी चौधरान में चौ. श्योसिंह की हवेली क्रांतिकारियों का कार्यालय थी।
वहीं बिजरौल स्वयं प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का केंद्र रहा। इसके अतिरिक्त,
बागपत में धार्मिक पर्यटन के कई केंद्र हैं जिनमें- त्रिलोक तीर्थ धाम, प्राचीन
दिगंबर जैन मंदिर, पुरा महादेव मंदिर, गुफा वाले बाबा मंदिर, नाग बाबा का मंदिर,
वाल्मीकि आश्रम (बालेनी) प्रमुख हैं। जनपद में सिनौली, लाखा मंडप, बिजरौल
गांव जैसे कई अल्पज्ञात स्थल भी हैं, जहां आगंतुक इतिहास से रूबरू हो सकते
हैं।
'वेलनेस टूरिज्म से बदलेगी बागपत की पर्यटन तस्वीर'
पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि 'बागपत अब केवल ऐतिहासिक और धार्मिक
विरासत के लिए ही नहीं, बल्कि वेलनेस और आधुनिक पर्यटन के नए केंद्र के रूप में भी
अपनी पहचान बनाने की ओर बढ़ रहा है। प्रदेश सरकार जनपद की पर्यटन संभावनाओं को
विकसित करने के लिए विभिन्न योजनाओं पर काम कर रही है। इसी कड़ी में हरिया खेड़ा
में 70.885 हेक्टेयर भूमि पर अंतरराष्ट्रीय योग एवं आरोग्य केंद्र विकसित किया जा
रहा है, जो बागपत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर विशिष्ट पहचान
दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।'

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