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Thursday, September 10, 2026

"ललित कला संस्थान में कला के माध्यम से बालिकाओं को कौशल विकास एवं आत्मनिर्भरता का प्रशिक्षण"

नित्य संदेश ब्यूरो 

मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के ललित कला संस्थान में कौशल विकास के अंतर्गत बालिकाओं एवं महिलाओं को भारतीय लोककलाओं तथा विभिन्न रचनात्मक कौशलों का निःशुल्क प्रशिक्षण प्रदान किया गया। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में पद्मश्री स्कूल एवं जवाहर नवोदय विद्यालय, बुलंदशहर से आई बालिकाओं ने भी उत्साहपूर्वक प्रतिभाग किया।


कुलपति प्रोफेसर संगीता शुक्ला के दिशा-निर्देशन एवं प्रेरणा से आयोजित इस कार्यशाला का उद्देश्य बालिकाओं को केवल कला सिखाना नहीं, बल्कि उन्हें कौशल सम्पन्न, आत्मनिर्भर एवं सशक्त बनाना रहा, ताकि वे अपनी रचनात्मक प्रतिभा को भविष्य में स्वरोजगार एवं आजीविका के साधन के रूप में विकसित कर सकें। कार्यशाला का शुभारंभ ललित कला संस्थान की उपनिदेशक प्रोफेसर अलका तिवारी द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया। उन्होंने कहा कि आज के समय में बालिकाओं को शिक्षा के साथ-साथ ऐसे व्यावहारिक कौशल प्रदान करना आवश्यक है, जो उन्हें आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ाएँ। कला एक ऐसा माध्यम है, जिसमें रचनात्मकता, कौशल और रोजगार—तीनों की संभावनाएँ मौजूद हैं।


प्रशिक्षण के दौरान बालिकाओं को भारत की समृद्ध लोक एवं पारंपरिक कलाओं जैसे लिप्पन कला, वारली आर्ट, मधुबनी, वंदना एवं पटचित्र कला आदि का प्रशिक्षण दिया गया। इसके साथ ही Best Out of Waste के अंतर्गत अनुपयोगी वस्तुओं को उपयोगी एवं आकर्षक कलात्मक वस्तुओं में परिवर्तित करने की विभिन्न तकनीकें भी सिखाई गईं। प्रशिक्षण में खाली काँच एवं प्लास्टिक की बोतलें, पुराने तेल के कैन, पुराने टायर, PVC पाइप, बाँस, कागज की रद्दी, टूटे हुए काँच तथा बची हुई टाइल्स जैसी अनुपयोगी वस्तुओं का रचनात्मक उपयोग करते हुए फ्लावर पॉट, गमले, वॉल हैंगिंग, दर्पण, डेकोरेटिव पॉट, फूलदान, पेन स्टैंड, टेबल मैट, रंगोली आदि बनाना सिखाया गया।


इस प्रकार कार्यशाला के माध्यम से बालिकाओं को पारंपरिक कला, आधुनिक रचनात्मक कौशल, अपशिष्ट पदार्थों के पुनः उपयोग तथा उपयोगी वस्तुओं के निर्माण जैसी अनेक स्किल्स का व्यावहारिक प्रशिक्षण मिला। इससे उनमें सृजनात्मकता एवं आत्मविश्वास बढ़ाने के साथ-साथ यह विश्वास भी विकसित हुआ कि उनके हाथों में मौजूद कला और कौशल भविष्य में आत्मनिर्भरता एवं स्वरोजगार का माध्यम बन सकता है।


कार्यशाला भारतीय लोककलाओं के संरक्षण एवं संवर्धन तथा पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रही। Reuse, Recycle and Create की भावना के साथ बालिकाओं ने बेकार समझी जाने वाली वस्तुओं को सुंदर एवं उपयोगी कलाकृतियों में परिवर्तित किया। कार्यशाला में प्रोफेसर अलका तिवारी, डॉ. पूर्णिमा वशिष्ठ, डॉ. शालिनी धामा, प्रवक्ता दीपांजलि, कृतिका एवं मोहम्मद खालिद का विशेष सहयोग रहा। छात्र स्तर पर जयश्री, आर्यन, उज्ज्वल, यशस्वी, गौरांगी एवं रिद्धिमा का सहयोग सराहनीय रहा।


यह प्रशिक्षण कार्यक्रम इस संकल्प के साथ आयोजित किया गया कि बालिकाओं को केवल शिक्षा नहीं, बल्कि हुनर भी मिले; केवल हुनर नहीं, बल्कि आत्मविश्वास मिले; और आत्मविश्वास के साथ अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर मिले। कला के माध्यम से कौशल विकास और महिला सशक्तिकरण की यह पहल भारतीय लोककलाओं को नई पीढ़ी तक पहुँचाने की दिशा में भी एक सार्थक प्रयास रही। इस अवसर पर पत्थर विशिष्ट अतिथि डॉ मितेंद्र गुप्ता प्रेस प्रवक्ता चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय ने कहा “बालिकाओं को केवल शिक्षा नहीं, हुनर भी मिले…और ललित कला संस्थान द्वारा आयोजित स्किल डेवलपमेंट कार्यशाला इस दिशा में सराहनीय प्रयास है”

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