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Thursday, September 3, 2026

आसिम वकार का AIMIM छोड़ना: क्या मुस्लिम राजनीति को जज़्बात से आगे सोचने का वक़्त आ गया है?

 

क़ारी महबूब हसन मुज़फ़्फ़रनगरी 

नित्य संदेश। सियासत में किसी दल का कोई कार्यकर्ता, पदाधिकारी या प्रवक्ता जब पार्टी छोड़ता है, तो आम तौर पर इसे दल-बदल की एक सामान्य प्रक्रिया मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। लेकिन जब जाने वाला व्यक्ति वर्षों तक उसी दल का राष्ट्रीय प्रवक्ता, मीडिया का प्रमुख चेहरा और नेतृत्व के रुख़ का बचाव करने वाला अहम व्यक्ति रहा हो, तो उसके फ़ैसले को महज़ 'पार्टी छोड़ने' की ख़बर समझना शायद राजनीतिक हक़ीक़त को बहुत छोटा कर देना होगा।

सैयद आसिम वकार का ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) से अलग होकर कांग्रेस में शामिल होना इसी तरह का मामला है। 2 सितंबर 2026 को कांग्रेस में शामिल होने के बाद आसिम वकार ने अपनी पूर्व पार्टी की राजनीतिक रणनीति पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि AIMIM ज़ाहिरी तौर पर तो भाजपा को हटाने की बात करती है, लेकिन ज़मीनी सियासत में वह कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य उन ताक़तों से लड़ती है जो भाजपा को सत्ता से हटाना चाहते हैं। उनका यह बयान महज़ एक पूर्व नेता की नाराज़गी है या इसके पीछे AIMIM के अंदर उभरने वाला कोई गहरा राजनीतिक असंतोष? यह सवाल अब संजीदा विचार की मांग करता है।


प्रवक्ता सिर्फ़ प्रवक्ता नहीं होता

किसी भी राजनीतिक दल का राष्ट्रीय प्रवक्ता महज़ माइक के सामने खड़ा होने वाला व्यक्ति नहीं होता। वह पार्टी की नीति, विचारधारा और राजनीतिक फ़ैसलों का सार्वजनिक चेहरा होता है। वह विरोधियों के सवालों का जवाब देता है, पार्टी पर होने वाली आलोचना का बचाव करता है और जनता के सामने दल के रुख़ को स्पष्ट और असरदार ढंग से पेश करता है। इसलिए एक प्रमुख राष्ट्रीय प्रवक्ता का अचानक यह कहना कि पार्टी की ज़मीनी सियासत उसके घोषित मक़सद से अलग है, निश्चित रूप से एक बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा करता है। अलबत्ता इंसाफ़ का तकाज़ा यह भी है कि आसिम वकार के आरोपों को अंतिम सच मानने के बजाय उन्हें उनका राजनीतिक रुख़ समझा जाए। किसी दल के 'बी टीम' या 'वोटकटवा' होने का फ़ैसला सिर्फ़ राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि चुनावी आंकड़ों, उम्मीदवारों, निर्वाचन क्षेत्रों, गठबंधनों और चुनावी नतीजों के सिलसिलेवार विश्लेषण से होना चाहिए।


क्या समस्या सिर्फ़ आसिम वकार की है?

असल सवाल शायद आसिम वकार नहीं, बल्कि AIMIM की राजनीतिक दिशा है:

क्या पार्टी के भीतर मतभेद की इतनी गुंजाइश है कि एक प्रमुख प्रवक्ता नेतृत्व से असहमति जताते हुए भी दल के अंदर रहकर अपनी बात रख सके?

क्या केंद्रीय नेतृत्व और राज्य स्तर के संगठन के बीच आवश्यक तालमेल और संवाद मौजूद है?

क्या राजनीतिक फ़ैसले व्यापक विपक्ष के परिप्रेक्ष्य में लिए जा रहे हैं या हर राज्य में AIMIM को एक स्वतंत्र राजनीतिक ताक़त के तौर पर खड़ा करने की कोशिश ही बुनियादी प्राथमिकता बन चुकी है?

ये सवाल इसलिए भी अहम हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों के लिए AIMIM ने अपनी सक्रियता तेज़ कर दी है। हाल के महीनों में असदुद्दीन ओवैसी ने समाजवादी पार्टी पर भी कड़े हमले किए हैं, जबकि दूसरी तरफ़ गठबंधन के दरवाज़े खुले रखने का संकेत भी दिया है। राजनीतिक विश्लेषक इसे एक 'दोहरी रणनीति' के तौर पर देख रहे हैं।


'वोटकटवा' राजनीति का पुराना सवाल

AIMIM पर सबसे बड़ा राजनीतिक आरोप यही रहा है कि उसकी चुनावी मौजूदगी कुछ क्षेत्रों में विपक्ष के वोटों को बांट देती है, जिसका अप्रत्यक्ष फ़ायदा भाजपा या उसके सहयोगियों को मिल सकता है। 

यह आरोप नया नहीं है।

बिहार के 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद भी AIMIM की भूमिका पर इस संदर्भ में तीखी बहस हुई थी। एक विश्लेषण के अनुसार, पार्टी ने 25 सीटों पर चुनाव लड़ा, 5 सीटें जीतीं और कई हल्क़ों में उसके वोटों ने विपक्षी उम्मीदवारों की चुनावी संभावनाओं को प्रभावित किया। हालांकि उसी विश्लेषण ने यह भी स्पष्ट किया कि AIMIM को महज़ 'वोट कटर' कहना उसकी पूरी राजनीतिक तस्वीर नहीं है; पार्टी मुस्लिम प्रतिनिधित्व और अधिकारों के सवाल को भी राजनीतिक मंचों पर प्रमुखता से उठाती रही है।

लिहाज़ा सवाल यह नहीं है कि AIMIM को चुनाव लड़ने का अधिकार है या नहीं।

बेशक हर राजनीतिक दल को अपनी विचारधारा और एजेंडे के साथ चुनावी मैदान में उतरने का लोकतांत्रिक अधिकार हासिल है।

असल सवाल यह है कि किसी ख़ास निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव लड़ने का फ़ैसला क्या राजनीतिक नतीजा पैदा करता है?

अगर किसी सीट पर तीन या चार विरोधी उम्मीदवारों के बीच मुक़ाबला हो और एक छोटे दल के कुछ हज़ार वोट नतीजों को पूरी तरह बदल दें, तो क्या उस दल को अपने फ़ैसले के दूरगामी राजनीतिक प्रभावों पर विचार नहीं करना चाहिए?

यह सवाल सिर्फ़ AIMIM से नहीं, बल्कि हर छोटी-बड़ी राजनीतिक पार्टी से पूछा जाना चाहिए।


ओवैसी की सियासत: आवाज़ भी, सवाल भी

यह भी एक हक़ीक़त है कि असदुद्दीन ओवैसी भारतीय राजनीति में मुसलमानों के मुद्दों पर सबसे मुखर, निडर और बेबाक बोलने वाली आवाज़ों में से एक हैं। वे संसद और जनसभाओं में नागरिकता, संवैधानिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, धार्मिक स्वतंत्रता और मुसलमानों के साथ होने वाले भेदभाव जैसे मुद्दों को लगातार उठाते रहे हैं। हाल के दिनों में भी वे भाजपा और आरएसएस के बयानों और नीतियों पर खुलकर प्रहार करते रहे हैं। यह भूमिका अपनी जगह बेहद अहम है। लेकिन किसी राजनीतिक नेता का साहसी भाषण और उसकी चुनावी रणनीति दो अलग-अलग चीज़ें हैं। सवाल यह है कि जो आवाज़ मुसलमानों के अधिकारों के लिए बुलंद होती है, क्या उसकी चुनावी रणनीति भी मुसलमानों के व्यापक राजनीतिक हितों को मज़बूत कर रही है? यह सवाल ओवैसी साहब से कोई बैर नहीं, बल्कि उनसे एक स्वाभाविक राजनीतिक अपेक्षा की अभिव्यक्ति है।


धार्मिक पहचान या विकास की सियासत?

मुसलमानों की राजनीति का केंद्र केवल धार्मिक पहचान नहीं होना चाहिए। मुसलमान भी इसी देश के नागरिक हैं और उनकी समस्याएं भी वही हैं जो करोड़ों अन्य भारतीयों की हैं: शिक्षा, रोज़गार, व्यापार, महंगाई, स्वास्थ्य, सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व, छोटे कारोबारों की सुरक्षा, महिला शिक्षा, युवाओं का भविष्य, संवैधानिक अधिकार और क़ानून का राज। अगर राजनीतिक दल केवल धार्मिक भावनाओं को चुनावी ताक़त में बदलते रहें, लेकिन शिक्षा, रोज़गार, आर्थिक तरक़्क़ी और राजनीतिक संस्थाओं में वास्तविक भागीदारी का कोई ठोस रोडमैप पेश न करें, तो सवाल उठेगा कि आख़िर राजनीति का अंतिम मक़सद क्या है? मुसलमानों को केवल यह बताना काफ़ी नहीं कि 'आपके साथ नाइंसाफ़ी हो रही है'। उन्हें यह भी बताना होगा कि इस नाइंसाफ़ी का राजनीतिक, क़ानूनी, शैक्षिक और आर्थिक समाधान क्या है?


भावनात्मक राजनीति से आगे बढ़ने का वक़्त

भारत जैसे बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक देश में धार्मिक पहचान सियासत का एक पहलू ज़रूर हो सकती है, लेकिन इसे राजनीति की एकमात्र धुरी बना देना नुक़सानदेह साबित हो सकता है। मुसलमानों को ऐसी राजनीति की ज़रूरत है जो उन्हें सिर्फ़ एक 'वोट बैंक' न समझे, बल्कि एक सशक्त नागरिक, मतदाता, व्यापारी, छात्र, शिक्षक, किसान, मज़दूर और पेशेवर के रूप में देखे। ऐसी सियासत जो मुसलमानों को अन्य वर्गों से अलग-थलग करने के बजाय न्याय, संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक सद्भाव के व्यापक मंच से जोड़े। क्योंकि भारत में मुसलमानों का भविष्य सिर्फ़ मुसलमानों के वोट से नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की समग्र दिशा से भी जुड़ा हुआ है। आसिम वकार के जाने से AIMIM को क्या संदेश मिलता है? आसिम वकार का कांग्रेस में जाना AIMIM के लिए इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण है कि वे कोई गुमनाम कार्यकर्ता नहीं थे। वे पार्टी का राष्ट्रीय चेहरा रहे और उत्तर प्रदेश में भी पार्टी की गतिविधियों से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्व थे। उनका यह क़दम ऐसे समय में सामने आया है जब AIMIM यूपी में अपना राजनीतिक दायरा बढ़ाने की कोशिश कर रही है और 2027 के विधानसभा चुनाव भी क़रीब हैं। इसलिए इसे सिर्फ़ 'एक व्यक्ति के जाने' के तौर पर देखना शायद सही नहीं होगा। अगर यह घटना पार्टी के भीतर मौजूद व्यापक असंतोष का संकेत है, तो AIMIM नेतृत्व को इस पर गंभीरता से आत्ममंथन करना होगा। और अगर यह केवल एक व्यक्ति का निजी राजनीतिक फ़ैसला है, तब भी नेतृत्व के लिए यह मौक़ा है कि वह अपनी राजनीतिक रणनीति को जनता के सामने और अधिक स्पष्ट करे।


ओवैसी साहब को एक बड़ा फ़ैसला करना होगा

असदुद्दीन ओवैसी के सामने शायद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि वे AIMIM को केवल एक मज़बूत मुस्लिम पहचान वाली पार्टी के रूप में ही सीमित रखना चाहते हैं, या इसे एक ऐसी राष्ट्रीय राजनीतिक ताक़त बनाना चाहते हैं जो मुसलमानों के साथ-साथ दलितों, पिछड़ों, वंचितों, युवाओं, महिलाओं और अन्य शोषित वर्गों के मुद्दों पर भी व्यापक राजनीतिक गठबंधन बना सके। मुसलमानों की राजनीतिक स्वायत्तता ज़रूरी है, लेकिन राजनीतिक अलगाव नहीं। अपनी आवाज़ उठाना ज़रूरी है, मगर अपनी आवाज़ को दूसरों की आवाज़ से जोड़ना भी सियासत का ही एक अहम हिस्सा है। अगर ओवैसी साहब वास्तव में भारतीय मुसलमानों को एक गरिमापूर्ण, सशक्त और मज़बूत राजनीतिक ताक़त बनाना चाहते हैं, तो उन्हें यह सवाल ज़रूर अपने सामने रखना चाहिए कि क्या उनकी मौजूदा चुनावी रणनीति अनजाने में उसी ताक़त को बिखेर तो नहीं रही जिसे वे मज़बूत करना चाहते हैं? मुस्लिम राजनीति को 'किसके ख़िलाफ़' से 'किसके लिए' तक आना होगा यह शायद आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है। मुस्लिम सियासत सिर्फ़ इस बुनियाद पर तय न हो कि किसके ख़िलाफ़ वोट देना है। बल्कि इसका बुनियादी सवाल यह होना चाहिए:


किसके लिए वोट देना है?

 किस विज़न और एजेंडे के लिए वोट देना है?

कौन बेहतर शिक्षा देगा?

कौन रोज़गार के अवसर पैदा करेगा?

 कौन संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त करेगा?

कौन युवाओं के भविष्य की गारंटी देगा?

कौन मुसलमानों को राजनीतिक फ़ैसलों में वास्तविक हिस्सेदारी देगा?

जब राजनीति 'डर' और 'प्रतिक्रिया' के दायरे से निकलकर 'एजेंडे' और 'प्रदर्शन' की तरफ़ बढ़ेगी, तब मुसलमान महज़ वोट बैंक नहीं रहेंगे, बल्कि एक जागरूक और अधिकार-संपन्न राजनीतिक शक्ति बनेंगे।

अंतिम बात

आसिम वकार का AIMIM छोड़ना एक राजनीतिक घटनाक्रम है, लेकिन इससे उठने वाले सवाल इस घटना से कहीं बड़े हैं।

यह सवाल सिर्फ़ ओवैसी से नहीं, बल्कि पूरे मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व से है।

क्या हमारी सियासत आने वाली पीढ़ी के लिए बेहतर शिक्षा के साधन तैयार कर रही है?

क्या वह युवाओं के लिए रोज़गार की राह आसान बना रही है?

 क्या वह मुसलमानों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और मज़बूत बना रही है?

क्या वह भारत के अन्य वर्गों के साथ आपसी विश्वास और एकजुटता क़ायम कर रही है?

और सबसे बढ़कर:

क्या हमारी सियासत मुसलमानों को बांटकर ख़ुद ताक़त हासिल करना चाहती है, या मुसलमानों को शिक्षा, अर्थव्यवस्था, एकता, संवैधानिक चेतना और लोकतांत्रिक भागीदारी के ज़रिये वास्तविक ताक़त देना चाहती है?

असदुद्दीन ओवैसी की निडरता और मुसलमानों के अधिकारों के लिए उनकी आवाज़ अपनी जगह क़ाबिले-तारीफ़ है। लेकिन बड़े राजनीतिक नेताओं की असली परीक्षा सिर्फ़ यह नहीं होती कि वे मंच से कितनी ऊंची आवाज़ में बोलते हैं; बल्कि असली परीक्षा यह होती है कि उनकी सियासत उनके समाज को पांच, दस या बीस साल बाद कहां ले जाकर खड़ा करती है।

आसिम वकार के जाने को इसी नज़रिये से देखने की ज़रूरत है।

शायद यह AIMIM के लिए महज़ एक सांगठनिक नुक़सान न हो, बल्कि अपनी राजनीतिक रणनीति पर नए सिरे से विचार करने का एक मौक़ा भी हो।

और शायद भारतीय मुस्लिम राजनीति के लिए भी यह वक़्त है कि वह जज़्बाती नारों से आगे बढ़कर शिक्षा, रोज़गार, अर्थव्यवस्था, संविधान, एकजुटता और गरिमापूर्ण राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अपना असल एजेंडा बनाए।

क्योंकि क़ौमें सिर्फ़ नारों से नहीं, बल्कि शिक्षा, संगठन, आर्थिक ताक़त और दूरदर्शी राजनीतिक फ़ैसलों से ही मज़बूत होती हैं।

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