नित्य संदेश
• साक्षात्कारदाता — डॉ पद्मा सिंह जी
• साक्षात्कारकर्ता — डाॅ इंदू जैन
प्रश्न- चार दशकों की शैक्षणिक यात्रा में आपने अनेक कार्य किये उनमें से आप किस कार्य को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानती हैं और उसके मानने का कारण?
उत्तर- मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि देवी अहिल्या विश्वविद्यालय की तुलनात्मक भाषा एवं संस्कृति अध्ययनशाला का विस्तार और उसे एक बहुआयामी अध्ययन एवं शोध केंद्र के रूप में विकसित करना है। जब मैंने कार्यभार संभाला, तब वहाँ केवल अनुवाद का एक पाठ्यक्रम संचालित था। यूजीसी की स्वीकृति से अनेक नए पाठ्यक्रम प्रारम्भ कराना, शोध की नई संभावनाएँ विकसित करना तथा भाषा प्रयोगशाला की स्थापना कराना मेरे लिए अत्यंत संतोष का विषय है। मेरा विश्वास है कि किसी व्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण उस संस्था का विकास है, जो आने वाली पीढ़ियों को लाभान्वित करे।
प्रश्न- तुलनात्मक भाषा एवं संस्कृति अध्ययनशाला में आपने अनेक नए पाठ्यक्रम प्रारम्भ किए। इस परिवर्तन के पीछे आपकी क्या सोच रही ?
उत्तर- मेरा उद्देश्य भाषा अध्ययन को केवल साहित्य तक सीमित न रखकर उसे रोजगार, शोध, संस्कृति और वैश्विक संवाद से जोड़ना था। इसलिए प्रयोजनमूलक हिन्दी, अंग्रेज़ी, संस्कृत, उर्दू तथा विदेशी भाषाओं के पाठ्यक्रम प्रारम्भ कराए, ताकि विद्यार्थी व्यापक दृष्टि के साथ अपने भविष्य का निर्माण कर सकें।
प्रश्न- हिन्दी भाषा को नई तकनीक से जोड़ने के लिए आपने 'भाषा प्रयोगशाला' की स्थापना कराई। आज के डिजिटल युग में हिन्दी के भविष्य को आप किस रूप में देखती हैं?
उत्तर- मैं हिन्दी का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल मानती हूँ। डिजिटल माध्यमों ने हिन्दी को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दी है। आवश्यकता इस बात की है कि हम हिन्दी में उच्चस्तरीय ज्ञान-सामग्री, शोध, तकनीकी शब्दावली और डिजिटल संसाधनों का निरंतर विकास करें। तकनीक और भाषा का समन्वय हिन्दी को और अधिक सशक्त बनाएगा।
प्रश्न- आपने मालवी भाषा एवं साहित्य को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल कराने का महत्वपूर्ण कार्य किया। क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन को लेकर आपकी क्या दृष्टि रही?
उत्तर- क्षेत्रीय भाषाएँ हमारी सांस्कृतिक स्मृति, लोकजीवन और परंपराओं की संवाहक होती हैं। यदि हम अपनी लोकभाषाओं को सुरक्षित नहीं रखेंगे, तो अपनी सांस्कृतिक विरासत का बड़ा हिस्सा खो देंगे। मालवी भाषा को पाठ्यक्रम में सम्मिलित कराने का उद्देश्य यही था कि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे और लोकसाहित्य को भी उचित सम्मान मिले।
प्रश्न- आपकी रचनाओं में कविता, ग़ज़ल, आलोचना, शोध और सम्पादन जैसी अनेक विधाएँ हैं। इनमें से कौन-सी विधा आपके व्यक्तित्व के सबसे निकट है और वही क्यों?
उत्तर- यद्यपि मैंने अनेक विधाओं में लेखन किया है, फिर भी कविता मेरे सबसे निकट है। कविता मेरे लिए आत्मसंवाद भी है और समाज से संवाद भी। जीवन की अनुभूतियाँ, मानवीय संवेदनाएँ और समय की चुनौतियाँ मैं सबसे सहज रूप में कविता के माध्यम से अभिव्यक्त कर पाती हूँ।
प्रश्न- आपकी पुस्तक 'हवा में तैरते दर्द के खामोश अफसाने' एवं अन्य काव्य-संग्रहों में भी संवेदना का विशेष स्वर दिखाई देता है। आपकी रचनात्मक प्रेरणा का मुख्य स्त्रोत क्या है?
उत्तर- मेरी प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत मानव जीवन है। समाज में घटित घटनाएँ,जीवन मूल्य, मानवीय संबंध, पीड़ा, संघर्ष, प्रकृति और आध्यात्मिक चिंतन—ये सभी मेरी रचनात्मक चेतना को प्रेरित करते हैं। मेरा प्रयास यही रहता है कि साहित्य केवल भावाभिव्यक्ति न होकर मनुष्य को अधिक संवेदनशील और मानवीय भी बनाए।
प्रश्न- एक शिक्षिका, प्रशासक, शोध-निर्देशक और साहित्यकार जैसी सभी भूमिकाओं के बीच आपने अपना सन्तुलन कैसे बनाए रखा ?
उत्तर- मेरे लिए प्रत्येक भूमिका एक उत्तरदायित्व थी, प्रतिस्पर्धा नहीं। समय का अनुशासन, कार्य के प्रति निष्ठा और साहित्य के प्रति आंतरिक समर्पण ने मुझे इन सभी दायित्वों के बीच संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा दी। मेरा मानना है कि यदि कोई भी कार्य सेवा-भाव से किया जाए तो संतुलन स्वतः बन जाता है।मैंने भी समय का सही प्रबंधन करके अपनी सभी भूमिकाओं का निर्वाह किया है।
प्रश्न- आज के युवा शोधार्थियों और नवोदित साहित्यकारों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी, विशेषकर शोध की गुणवत्ता और मौलिक लेखन के सन्दर्भ में आप क्या कहना चाहेंगी?
उत्तर- मैं युवाओं से यही कहना चाहूँगी कि शोध कार्य केवल उपाधि प्राप्त करने का सरल माध्यम नहीं है , बल्कि सत्य की खोज की सतत चलने वाली प्रक्रिया है। मौलिक चिंतन, गहन अध्ययन, प्रमाणिक स्रोतों का उपयोग और बौद्धिक ईमानदारी ही श्रेष्ठ शोध की पहचान हैं। साहित्यिक शोध में भी अनुकरण नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र दृष्टि और संवेदना विकसित करना आवश्यक है।हम अपने शोध से कोई नया विचार या दर्शन स्थापित करें और भविष्य के लिए नया सूत्र दे सकें यही शोध की सार्थकता है।
प्रश्न- आप ने 'श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति' में साहित्य एवं संस्कृति मंत्री के रूप में अनेक साहित्यिक आयोजन किया है। वर्तमान समय में साहित्यिक संस्थाओं की भूमिका को आप किस प्रकार देखती हैं ?
उत्तर- मेरे विचार से सभी साहित्यिक संस्थाएँ समाज और साहित्य के बीच एक सशक्त सेतु का कार्य करती हैं। वे नई प्रतिभाओं को मंच प्रदान करती हैं, वरिष्ठ और नवोदित रचनाकारों के बीच संवाद स्थापित करती हैं तथा साहित्यिक संस्कारों का संवर्धन करती हैं। आज के समय में इन संस्थाओं की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि वे साहित्य को समाज से जीवंत रूप में जोड़ती हैं।युवा प्रतिभा को आगे बढ़ने के अवसर जुटाना भी संस्थाओं का कार्य है। सामाजिक और साहित्यिक संस्थाएं एक अच्छे समाज की नींव होती हैं।
प्रश्न- आज पर्यावरण संरक्षण विश्व की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जन-जागरण में साहित्य की क्या भूमिका हो सकती है? एक साहित्यकार के रूप में आप क्या कहना चाहेंगी?
उत्तर- साहित्य मनुष्य की संवेदना को जागृत करता है। जब साहित्य प्रकृति के सौंदर्य, उसके संकट और मनुष्य के उत्तरदायित्वों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है, तब वह समाज में पर्यावरण के प्रति चेतना विकसित करता है। मेरा विश्वास है कि पर्यावरण संरक्षण केवल वैज्ञानिक विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक दायित्व भी है, और साहित्य इस चेतना को सशक्त बना सकता है।प्रकृति के प्रति चेतना जाग्रत करना उसका संरक्षण करने की प्रेरणा देना एक लेखक का नैतिक दायित्व है।
प्रश्न- यदि आपको अपने संपूर्ण जीवन-दर्शन और साहित्य-साधना को एक संदेश में समेटना हो तो इस पर आप क्या कहेंगी ?
उत्तर- मैंने सदैव यही विश्वास किया है कि ज्ञान का उद्देश्य केवल जानकारी अर्जित करना नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज को बेहतर बनाना और दिशा दिखाना भी है। साहित्य मेरे लिए आत्मानुभूति, मानवीय संवेदना और लोकमंगल की साधना है।मेरा संदेश तो यही होगा कि जीवन में हर पल सीखते रहिए, रिश्तों के प्रति संवेदनशील बने रहिए और अपने ज्ञान एवं सृजन को समाज के कल्याण से जोड़िए। सकारात्मक सोच हमें अनावश्यक चिंताओं से मुक्त रखकर समय के साथ चलना सिखाती है।
डॉ• पद्मासिंह
प्राचार्य एवं निदेशक (से•नि•)
तुलनात्मक भाषा एवं संस्कृति अध्ययनशाला, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर मध्य प्रदेश

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