नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। भद्रो नो अग्निराहुतो। भद्रा नो प्रशस्तय: के उद्घोष के साथ शास्त्रीनगर स्थित निज निवास पर सामवेद की नवमी कथा का द्वितीय दिवस सम्पन्न हुआ। कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने प्रो. सुधाकराचार्य त्रिपाठी की प्रेरणा से सामवेद के सप्तम प्रपाठक के द्वितीयार्ध की कथा सुनाई। कथा का प्रारम्भ "अञ्जते व्यञ्जते समञ्जते क्रतुं रिहन्ति मध्वाभ्यञ्जते" इस मंत्र के गुंजार से हुआ।
आज की कथा के देवता अग्नि रहे। कथा में 12 आदित्यों में से मित्र और वरुण से सम्बद्ध दिनचर्या का वर्णन किया गया। प्रो. पूनम ने बताया कि 30 डिग्री से 45 डिग्री तक मित्र और 45 डिग्री से 60 डिग्री तक वरुण आदित्य का काल होता है। उन्होंने इन दोनों आदित्यों का परिचय तथा उनके गणों - ऋषि, यक्ष, गंधर्व, नाग, राक्षस और अप्सरा के विषय में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि अग्नि ऊर्जा का प्रतीक है और हमारे शरीर में यही ऊर्जा हमें क्रियाशील बनाती है। सूर्य के रूप में यही ऊर्जा हमारी दिनचर्या का निर्धारण करती है। उन्होंने सूर्य के स्वरूप और वैशिष्ट्य को विभिन्न धातुओं से स्पष्ट किया और अमरकोश से सूर्य के 37+17+3+5 नामों का उद्धरण दिया। एक मंत्र के प्रसंग में यजुर्वेद के चमक मंत्रों को उद्धृत करते हुए उनमें प्रयुक्त संख्याओं के रहस्य को भी समझाया।
घृताची, भानु, सूर्य, घृतकेशी, शीरशोचिष, मित्र, सर्पिष् आदि पदों को स्पष्ट करते हुए दिनचर्या में इनकी भूमिका पर प्रकाश डाला। साहित्यशास्त्र और लौकिक जीवन के उदाहरण भी प्रस्तुत किए। कथा में आए मंत्रों में ऋषिगण प्रार्थना करते हैं कि हमारी स्तुतियाँ, मन, विचार और संस्कार कल्याणकारी हों और हमारी बुद्धि स्थिर रहे। प्रो. पूनम ने मंत्रों के माध्यम से दिनचर्या को अनुशासित और व्रतमय बनाने का संदेश दिया।

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