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Friday, July 3, 2026

प्रेम शब्द एक, अर्थ अनेक —रविंद्र तंवर 'सूर्योदय'

नित्य संदेश

प्रेम शब्द एक, अर्थ अनेक होते है। सबने इसे अपने हिसाब से परिभाषित किया लेकिन समझ कोई न सका। जिसने इसकी कदर की उसे मिला नहीं जिसे मिला उसने कदर नहीं की।


प्रेम पाना सभी चाहते है लेकिन उससे नहीं जो देना चाहता है। उससे जो हमे देना नहीं चाहता।


ऐसा क्यूं होता है जो हमे प्रेम करता है हम उसे प्रेम ही नहीं कर पाते, और उससे प्रेम पाना चाहते है जो हमारा हो ही नहीं सकता ।


नदियों ने, पहाड़ों को छोड़ा और सागर को अपनाया। सागर ने क्या किया नदियों का आस्तित्व मिटा कर उन्हें ही खारा कर दिया ।


लेकिन, जब झरने ने नदियों को अपनाया तो और भी मीठा कर दिया।यही फर्क है एक स्त्री और पुरुष के चुनाव में।


सच है प्रेम किसी को पाने की वस्तु है ही नहीं, प्रेम तो बस देने का नाम है किसी का हो जाना या किसी को अपना होने देना। प्रेम कभी परिभाषित हो ही नहीं सकता ।


इसे बस जिया जाता है, उसके साथ जो आपकी कदर कर सके।इसलिए प्रेम में उसके आत्मसात होना जो आपसे प्रेम करे। जिसे अस्तित्व ने चुना हो आपके लिए ।


और मेरी नजर में, प्रेम यहीं है, परिभाषित करना नहीं निभाना। क्योंकि प्रेम सब कर सकते है, परिभाषित भी अपनी परिस्थिति के हिसाब से कर लेते है। लेकिन निभाते कुछ ही लोग है ।


इसलिए उसे चुनना जो निभा सकते और पूर्ण कर सकते आपकी यात्रा खुद तक पहुंचने की।


—रविंद्र तंवर 'सूर्योदय'

बड़वाह (म.प्र.)  

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