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Wednesday, June 17, 2026

"वो आँसू" —शीला बड़ोदिया की लघुकथा

 

नित्य संदेश 

वो आँसू 

  ऑफिस में लंच का समय हो गया , रक्षा 2 साल से इस जगह काम कर रहीं है। "अरे! सब जल्दी आओ, जोर से भूख लग रहीं है", अश्विन ने कहा। रक्षा, सावि,अश्विन और नील सभी दोस्त एक साथ बाते करते हुए खाना खा रहे हैं, तभी अश्विन पूछता है "रक्षा तुम आज बहुत बहुत चुप हो?"

     रक्षा फीकी हंसी हंसते हुए "नहीं तो, बहुत काम है ना, बस थोड़ा थक गयी।" पर अश्विन ने जैसे उसकी आँखें जैसे पढ़ ली। कोई बात नही, छुट्टी लेकर आराम कर लो। 

   रक्षा ना बाबा ना, बॉस सैलरी काट लेंगे, चलो सब, अपने अपने काम में लग जाओ। काम करते हुए रक्षा की नजर घड़ी पर पड़ी। अरे 6 बजने वाले हैं, मुझे तो घर जल्दी जाना हैं। लेट पहुंची, तो फिर घर में

,क्या कहूँगी?

      अश्विन, "रक्षा चिंता क्यों करती हो, मैं छोड़ देता हूँ।" "नहीं नहीं मैं चली जाऊँगी"रक्षा हड़बड़ाहट में अपना सामान, बेग उठाने लगती है। अश्विन, रक्षा का हाथ पकड़ लेता है, "बताओं क्या परेशानी है, रक्षा?" "नहीं, कुछ भी, तो नहीं " घबराते हुए, रक्षा बोली। अश्विन बोला,"मेरी तरफ देखो, हम अच्छे दोस्त हैं ना, तुम मुझे अपनी प्रॉब्लम बता सकती हो।" रक्षा की आंखों से आँसू बह निकले,"वो जतिन आज जल्दी घर आने वाले हैं"  कहती हुई, घर के लिए निकल गयी। 

      अश्विन उसकी आँखें पहले ही पढ़ चुका था, आंसुओं ने बस उसे और पक्का कर दिया। 



— शीला बड़ोदिया

लेखिका शिक्षिका हैं।

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