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Sunday, June 14, 2026

संघ एवं भारत की राजनीतिक संस्कृति



नित्य संदेश। राजनीतिक संस्कृति लोकतांत्रिक प्रणालियों के समग्र प्रकृति एवं कार्यप्रणाली को आकार देने में एक मौलिक भूमिका प्रदान करती है। यह नागरिकों के सामूहिक मूल्यों, मान्यताओं, दृष्टिकोण एवं व्यवहार के प्रतिदर्श का प्रतिनिधित्व करती है जो यह अभिव्यक्त करते हैं कि नागरिक राजनीतिक संस्थाओं, नेतृत्व एवं सार्वजनिक विषयों के प्रति कैसे जुड़ते हैं ? सरकार के विविध अंगों के कार्यों का संहिता करण करने एवं उनको संवैधानिक सीमाओं में सीमित करके क्रियान्वयन करना ही “ राजनीतिक संस्कृति “है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सामाजिक ,सांस्कृतिक, गैर - राजनीतिक एवं हिंदू राष्ट्रवादी संगठन है जिसकी स्थापना सन् 1925 में महाराष्ट्र के नागपुर में संत व्यक्तित्व एवं सामाजिक चिंतक श्री केशव बलिराम हेडगेवार जी ने किया था। संघ की स्थापना देश को औपनिवेशिक पराधीनता से स्वतंत्र करने के लिए हुआ था। संघ वैश्विक स्तर का सबसे बड़ा सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन है जिसका लक्ष्य “ भारत को अखंड सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में स्थापित करना है।” संघ ने भारत की बुनियाद को मजबूत एवं विस्तारित किया है।इसने भारत की संप्रभुता की रक्षा किया है , कमजोर वर्गों को सशक्त बनाया है एवं भारत के सांस्कृतिक मूल्यों, सभ्यतागत मूल्यों एवं सनातन के मूल्यों का उन्नयन किया है। संघ नि:स्वार्थ सेवा का जीवंत सामाजिक संगठन है। इसके कार्यकर्ता समर्पित एवं आत्मार्पित भाव से समाज के हर क्षेत्र में सहयोग कर रहे हैं। इसका मौलिक उद्देश्य “ भारत को परम वैभववान ,सर्वशक्तिमान एवं वैश्विक गुरु के स्तर पर स्थापित करना है।”

भारत की राजनीतिक संस्कृति ऐतिहासिक अनुभवों, वैचारिक आंदोलनों तथा राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के उच्च मूल्यों से प्रेरित रही है। तदनुरूप संघ ने भी “विकेंद्रीकृत अनुशासित संरचना” को विकसित किया है जो जमीनी स्तर पर अनुशासन, कार्यशाला प्रशिक्षण एवं वैचारिक अभिविन्यास पर केंद्रित है। इस संगठन ने अपने सदस्यों के बीच “एकता एवं सामूहिक उद्देश्य की भावना “ का विकास है। संघ के ऐतिहासिक विकास को एक सामाजिक- सांस्कृतिक संगठन के रूप में देखा जा सकता है जिसने भारत के सार्वजनिक जीवन में दमदार, परिवर्तनशील एवं महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है।

प्रथम सर संघचालक डॉ. हेडगवार जी ने हिंदुओं के मध्य “सामाजिक एकता एवं राष्ट्रीय चेतना की अभिवृद्धि” के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। इस संगठन का निर्माण औपनिवेशिक शासन के क्रूर एवं पीड़क चरित्र एवं ब्रिटिश नौकरशाही के दमन एवं शोषण के कारण भारतीयों में हीनता की भावना को दूर करके उनमें राष्ट्रीय चेतना की भावना के संचरण के लिए हुआ था । तत्कालीन औपनिवेशिक शासन क्रूर व्यवहार एवं अनुत्तरदायी शासन का पर्याय हो चुकी था। शाखा संघ की आधारभूत इकाई है जो संघ को जमीनीस्तर से जोड़ती है। शाखा वह कार्यक्रम स्थल है जहां पर स्वयंसेवकों को वैचारिक एवं शारीरिक स्तर पर प्रशिक्षित किया जाता है ।भारत में 83 हजार से ज्यादा शाखाएं हैं । शाखा में शारीरिक व्यायाम एवं खेलों के साथ-साथ “सामूहिक काम” एवं “नेतृत्व कौशल” से जुड़े काम होते हैं। शाखा में “ आवागमन” एवं “ आत्मरक्षा की तकनीक” सिखाई जाती है। शाखा से ही स्वयंसेवकों को वैचारिक शिक्षा दी जाती है। इसी में स्वयंसेवकों को हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्रवाद एवं संघ के अन्य मौलिक सिद्धांतों के विषय में “बौद्धिक क्षितिजीकरण “ किया जाता है।

संघ की वैचारिक नींव एक महत्वपूर्ण प्रतिदर्श का निर्माण करती है जिसके बौद्धिक मार्गदर्शन से समाज, राष्ट्र, राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रवाद के आयामों में “ उत्तरोत्तर विकासात्मक पहलुओं “ को समझा जा सकता है। सन् 1925 में स्थापना के पश्चात संघ ने एक ऐसे “ विश्व दृष्टिकोण” को स्पष्ट करने का प्रयास किया है जो सांस्कृतिक पहचान ,सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक अनुशासन को बढ़ा रहा है।

संघ के मौलिक सिद्धांतों में मूल में “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा” है। राष्ट्र सांस्कृतिक जीवंत इकाई है जो सांस्कृतिक परंपराओं, सांस्कृतिक मूल्यों, सांस्कृतिक आदर्शों ,ऐतिहासिक अनुभवों एवं सभ्यतागत मूल्यों से बनता है। भारत के पास “समृद्ध सांस्कृतिक विरासत” है जो राष्ट्रीय एकता को आधार प्रदान कर रहा है। संघ ने चरित्र -निर्माण एवं व्यक्ति- निर्माण के साधनों से समाज को “संतुलित दृष्टिकोण “ प्रदान करने में सहयोग किया है। यह भौतिक कल्याण ,नैतिक कल्याण एवं आध्यात्मिक कल्याण का उन्नयन करता है । समग्र मानवतावाद राष्ट्रीय विकास के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में विकेंद्रीकरण, सामाजिक सद्भाव एवं नागरिक भागीदारी को उन्नयन कर रहा है। संघ ने विकेंद्रित अनुशासित संरचना को विकसित किया है जो धरातल स्तर पर राष्ट्र, राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रवाद के विकास में सहयोगी है।

21वीं शताब्दी में संघ ने भारत के राजनीतिक संस्कृति को नवीन आयाम दिया है। अपने अस्तित्व की एक सदी के पश्चात संगठन भारत के सबसे वृहद सामाजिक, गैर- राजनीतिक एवं सांस्कृतिक संगठन की महत्ता को प्रासंगिक बनाया है। संगठन की प्रासंगिकता एवं उपादेयता दिन- प्रतिदिन बढ़ रही है । भारत के लोकतांत्रिक संस्कृति एवं राजनीतिक संस्कृति के विकास में संघ की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसने राजनीतिक समाजीकरण ,समाजीकरण, राष्ट्रवाद एवं शैक्षणिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रभाव प्रदान किया है। संघ ने सामाजिक क्षेत्र में अपनी भूमिका बढ़कर अपने वैचारिक दृष्टिकोण एवं नागरिक भागीदारी को प्रोत्साहित करके राजनीतिक संस्कृति की मजबूती में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान किया है।

प्रोफेसर वीरेंद्र सिंह नेगी 
डूटा प्रेसिडेंट

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