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Sunday, June 21, 2026

पिता की शिक्षा पर आधारित एक भावपूर्ण कविता — प्रभा तिवारी

नित्य संदेश

पिता मेरे आदर्श

पिता मेरे आदर्श महान

जीवन पथ के उज्ज्वल दीपक समान।

माँ का वात्सल्य, पिता का अनुशासन,

संस्कारों का अमूल्य धन।


बचपन से लेकर यौवन तक,

पिता रहे मेरे जीवन के स्तंभ।

कठोर बाहर से, भीतर स्नेह भरा,

उनका प्रेम सदा मेरे संग रहा।


 कहते थे —

"बेटा एक दिन जाना है दूसरे घर,

जहाँ रीति-रिवाज होंगे अलग, स्वभाव होंगे भिन्न।

धैर्य रखना, समझदारी से निभाना,

तभी जीवन में सुख पाना।

कितनी भी ऊँचाई छू लो,

पैर हमेशा ज़मीन पर रखना।"


उनके विचार बने मेरे गीत,

अनुशासन से जीवन हुआ अतीत।

ससुराल में भी उनकी शिक्षा संग,

हर ज़िम्मेदारी निभाई उमंग।


पिता कवि, विचारक, ग़ज़ल प्रेमी,

माँ लोकगीतों की मधुर धारा।

उनकी विरासत मुझमें बहती रही,

गीत और शब्दों की प्यारी कला।


जब भी उदासी घेरती है,

उनकी वाणी गूँजती है 

"छोड़ दे शरीर की चिंता को, मत कर किसी की आस,

तेरा राम तो ज़िंदा है,

सुख-दुख में वही रहेगा साथ।"


उनकी शिक्षा थी 

"सच्चे दिल से जिसे अपना मानो,

उसके बारे में कभी गलत मत सोचो।

If the heart is pure and love be strong,

Thinks can never go badly wrong."


आज भी जब पिता की याद आती है,

आँखें नम हो जाती हैं।

पर मन में गर्व है कि मेरे पिता मेरे आदर्श थे,

और सदा रहेंगे।


माँ-पिता का आशीर्वाद बना रहे,

मैं उन्हीं के पदचिन्हों पर चलती रहूँ।



— प्रभा तिवारी

इंदौर (म.प्र.) 

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