-इमामबारगाह और अजाखानों में शुरू हुआ मजलिसों का दौर
सलीम सिद्दीकी
नित्य संदेश, मेरठ। सफ़र ए करबला के साथ मुहर्रम का आगाज़ हो चुका है। यह वही चांद है जो रसूल के खानदान की कहानी सुर्ख खून से सुनाता है। यह वही दिन है जब मौला हुसैन ने अपने कुनबे के साथ करबला के सफर का आगाज किया। यह कोई मामूली सफर नहीं था, कुर्बानियों का सफर था। यह वो सफर था जिसने इस्लाम को ता-कयामत इज़्ज़त और शोहरत बख्श दी।
इस सफर में इमाम हुसैन तीरों और नेजों पर लेटे। नन्हे
अली असगर के गले को तीर से छेदा गया। यहां इमाम हुसैन की आखिरी औलाद तक कुर्बान हो
गई। हजरत कासिम को दूल्हा बनाकर उनकी मां ने जंग के मैदान में भेजा। हम शक्ल ए पयंबर
अली अकबर कत्ल हुए, औन ओ मुहम्मद भी कत्ल कर दिए गए। अली के बहादुर शेर अब्बास के बाजू
काट दिए गए, और तो और मौला हुसैन तक तन्हा कत्ल हुए। यहां आप इंसानियत का 'चीरहरण'
देखिए कि एहल ए बैत को खड़ा किया गया। धूप में बैठाकर अजियत पहुंचाई गई। 72 सरों की
बोलियां तक लगाई गईं। कुर्बानी अजीम हो सकती है, मीरास और विरासत हो सकती है, मगर जुल्म
इतना बड़ा कैसे हो सकता है?
नम कर गया कर्बला का मंजर
रसूल की बेटियां और नवासियां न जाने कितनी गलियों और कूचों
में बिना चादर फिराई गईं। फिर 700 फासिकों और नशेड़ियों की महफिल में यजीद के दरबार
लाई गईं। इसी महफिल में इमाम सज्जाद को जंजीरों में बांध दिया गया। कुल मिलाकर जंग
एक करबला सिर्फ एक हकीकत नहीं, बल्कि वह मंजर है कि जिन आंखों से गुजर जाए उन्हें नम
कर जाए।
सवा दो माह चलेगी मजलिस
बुधवार से शुरू हुआ मजलिसों का सिलसिला अब 2 महीने और
8 दिनों तक लगातार जारी रहेगा। इस दौरान मातम भी होगा, अश्क भी बहेंगे और अज़ादर जंगे
करबला के जाबाजों को खिराज ए अकीदत पेश करेंगे।

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