नित्य संदेश। आज यौमे आशूरा है—वह दिन जिसने इंसानियत, इंसाफ़ और सच्चाई के लिए दी गई सबसे महान कुर्बानी को हमेशा के लिए इतिहास में अमर कर दिया। कर्बला की तपती रेत पर इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके वफ़ादार 72 साथियों ने ज़ुल्म, जुल्मत और नाइंसाफ़ी के सामने सिर झुकाने के बजाय शहादत को गले लगाया। उन्होंने पूरी दुनिया को यह पैग़ाम दिया कि हक़ और इंसाफ़ के रास्ते पर डटे रहना ही असली कामयाबी है, चाहे उसके लिए सबसे बड़ी कुर्बानी ही क्यों न देनी पड़े।
क़त्ल-ए-हुसैन अस्ल में मर्ग-ए-यज़ीद है,
इस्लाम ज़िंदा होता है हर कर्बला के बाद।
यौमे आशूरा हमें सब्र, इस्तिक़ामत, ईमान, इंसाफ़ और इंसानियत की रक्षा का सबक़ देता है।
सलाम या हुसैन!
सलाम उन तमाम शहीदाने-कर्बला पर, जिन्होंने प्यासे रहकर भी दीन, इंसाफ़ और इंसानियत की ख़ातिर अपनी जानें कुर्बान कर दीं।
या हुसैन (अ.स.)
मैराजुद्दीन अंसारी
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
भारतीय बुनकर सेवा समिति (रजि०
उपाध्यक्ष
हज़रत बाले मियां
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