नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने प्रो.सुधाकराचार्य त्रिपाठी जी की प्रेरणा से शास्त्रीनगर में निजनिवास पर सामवेद की अष्टमकथा के तृतीय दिन सामवेद के पञ्चम एवं षष्ठ प्रपाठक की कथा की और पवमान सोम इन्द्र और पवमान अध्येता सम्बन्धी मन्त्रों की कथा कही।
पवमान सोम जल की वृष्टि कर विभिन्न अन्नों और विभिन्न वनस्पतियों को उत्पन्न करता है। इस प्रसंग में मिलेट्स अर्थात् मोटे अनाज की भी चर्चा हुई। सोम स्तोताओं को अन्न और धन की प्राप्ति कराने के लिए वायु, मित्रावरुण, मरुत्, द्यावापृथिवी तथा अन्य देवताओं के हर्ष को बढ़ाता है। वह अपनी सामर्थ्य से उत्तम ऐश्वर्य को प्राप्त करते हुए उसके समुचित वितरण की इच्छा करता है। वह हमें दिशा और गति प्रदान करता है।
सोम यज्ञस्थान में असंख्य कर्मों का सम्पादन करने की अभिलाषा रखता है। डॉ पूनम ने सोम के माध्यम से अन्त: और बाह्य शुद्धि के महत्त्व को समझाया। इस प्रसंग में सृष्टि चक्र को, इकोलॉजी सिस्टम को भी स्पष्ट किया है। सोम वृत्र का नाश करने वाले इन्द्र के बल को बढ़ाता है। इन्द्र आत्मा है, दस उंगलियां दस इन्द्रियाँ हैं सोम शोधन का अभिप्राय है रसपरिपाक। हमारे शरीर में रक्त के रूप में सोम अवतरित होता है।
पावमानी ऋषियों द्वारा संग्रहीत ऋचाएं हैं जो इनका अध्ययन करता है, उसके लिए सरस्वती स्वयं दुग्ध, घी, शहद जैसे पोषक तत्त्व उपलब्ध कराती है।
ऋषि प्रार्थना करते हैं कि देवतागण जिन साधनों से स्वयं को पवित्र करते हैं उन्हीं साधनों से पवित्र ऋचाएं हमें भी पवित्र करें। पावमानी पुनन्तु नः।

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