लंदन म्यूजियम से आएगी वाग्देवी की मूर्ति
सपना सी.पी. साहू
नित्य संदेश, इंदौर। धार के बहुचर्चित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की वैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट को आधार मानते हुए हिंदू पक्ष के दावे को स्वीकार कर लिया है और स्पष्ट किया है कि विवादित परिसर मूलतः वाग्देवी (मां सरस्वती) का मंदिर है। कोर्ट के इस निर्णय के साथ ही हिंदू पक्ष को परिसर में पूजा-अर्चना करने की अनुमति मिल गई है, जिससे दशकों से चले आ रहे इस विवाद में एक नया मोड़ आ गया है।
न्यायालय के इस फैसले के बाद हिंदू पक्ष में हर्ष का माहौल है। 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' के वकील विष्णु शंकर जैन ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे सत्य की जीत बताया। उन्होंने जानकारी दी कि माननीय न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष के अधिकारों के संदर्भ में भी टिप्पणी की है।
कोर्ट ने सुझाव दिया है कि यदि मुस्लिम पक्ष चाहे, तो सरकार उन्हें मस्जिद निर्माण के लिए अलग से उपयुक्त भूमि आवंटित कर सकती है। विष्णु शंकर जैन के अनुसार, एएसआई की रिपोर्ट ने इस बात की पुष्टि की है कि वर्तमान संरचना के नीचे एक प्राचीन मंदिर के अवशेष मौजूद हैं।
वहीं दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष ने हाई कोर्ट के इस फैसले पर असहमति जताई है। पक्षकारों का कहना है कि वे इस निर्णय को स्वीकार नहीं करते और इसके विरुद्ध जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करेंगे।
फैसले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन पूरी तरह सतर्क है। धार और इंदौर सहित आसपास के जिलों में सुरक्षा व्यवस्था के कड़े इंतजाम किए गए हैं और संवेदनशील इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है ताकि क्षेत्र में शांति और कानून व्यवस्था बनी रहे।
यह विवाद 11वीं सदी के परमार कालीन राजा भोज द्वारा निर्मित भोजशाला को लेकर है, जिसे हिंदू पक्ष सरस्वती मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला की मस्जिद बताता रहा है। अब एएसआई की वैज्ञानिक जांच ने इस कानूनी लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाई है।

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