नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल द्वारा मयूर विहार में प्रो. सुधाकराचार्य त्रिपाठी के आवास पर सामवेद की सप्तमकथा के तीसरे दिन सामवेद में तृतीय प्रपाठक के उत्तरार्ध में पवमान सोम, इन्द्र,अग्नि, मित्रावरुण और इन्द्राग्नी देव सम्बन्धी मन्त्रों की कथा कही गई।
सोम नृचक्षा हैं, पवमान और पवमानवृषभ हैं। भुवनों के स्वामी हैं। सोम से मधुमय, घृतमय धाराएं प्रवाहित होती हैं। सोम से ही सृष्टि होती है। सोम समुद्र सबको गीला कर देता है उसी प्रकार सोम समस्त वैभव प्रदान करता है। सोम इन्द्र को हर्षित और तृप्त करता है उसी प्रकार मानव मात्र के आनन्द को बढ़ाये, ऋषि ऐसी प्रार्थना करते हैं। सोम स्वयं पवित्र है और सबको भी पवित्र करता है। विकारों का शमन करता है। सोम विद्वानों को ज्ञान, देवताओं को गति और रक्षा करने योग्य याजकों को संरक्षण प्रदान करता है। निर्बल स्तोताओं को सब प्रकार से धनधान्यों से तृप्त करता है। स्तुति करने वाले उससे स्थिर सम्पत्ति और यश की कामना करते हैं। प्रो. पूनम ने परागण की प्रक्रिया के माध्यम से पुनर्जन्म की प्रक्रिया को समझाया। अष्टपदी और नवस्रक्ति पद को स्पष्ट किया। ऋषिगण सोमरसपान हेतु इन्द्राग्नी का आह्वान करते हैं।

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